अभिव्यक्ति की अनुभूति / शब्दों की व्यंजना / अक्षरों का अंकन / वाक्यों का विन्यास / रचना की सार्थकता / होगी सफल जब कभी / हम झांकेंगे अपने भीतर

शनिवार, 30 मार्च 2013

बुआ जी का बुलंद हौंसला




मेरे पिताजी स्वर्गीय श्री केशव लाल ठक्कर की बुआ जी 97 वर्षीय श्रीमती राम बेन कोठारी के हौंसले आज भी बुलंद हैं। वे गुजरात के सरहदी जिले कच्छ के शहर अंजार के रामकृष्ण महावीर नगर स्थित मकान में अपने दूसरे पुत्र श्री देवसी भाई के साथ निवासरत हैं। वे अपने कपडे, बर्तन धोने से लेकर सभी दैनिक कार्य बिना किसी की मदद लिए खुद करती हैं। अंजार में रहने वाले अपने अन्य पुत्रों-पुत्री, नाती-पोतों से मिलने उनके घर अक्सर वे अकेली ही ऑटो रिक्शा में बैठ कर निकल पड़ती हैं। यह मेरा सौभाग्य है कि बचपन से ही मुझे उनका स्नेह और आशीर्वाद मिलता रहा है। उनकी खुद्दार जीवन शैली से मुझे सदैव प्रेरणा मिलती रही है। 97 वसंत देख चुकी बुआ जी का सानिध्य अंजार में इस वसंत पंचमी को दिन भर मिला। उतार चढाव भरी उनकी जिन्दगी के यादगार लम्हों के संस्मरण की आधे घंटे की वीडियो रिकार्डिंग करने का भी सुअवसर मिला। अंजार में आये दिन भूकंप के झटके महसूस होते रहते हैं, लेकिन बुआ जी इससे बिलकुल नहीं घबराती हैं। वे अंजार में अब तक आये दो बड़े भूकंप की त्रासदी झेल चुकी हैं।21 जुलाई 1956 और 26 जनवरी 2001 को सुबह अंजार समेत कच्छ में आये विनाशकारी भूकंप से जड़ी त्रासदी को वे आज भी नहीं भूली हैं। हालांकि दोनों बार वे सकुशल रहीं। 26 जनवरी 2001 को सुबह जब भूकंप आया तब वे अंजार के गंगा नाका स्थित अपनी पुरानी हवेली के स्नान गृह में थीं। जबकि उनकी बड़ी बहू लीलावन्ती बेन रसोई घर में थी। संयुक्त परिवार के बाकी सदस्य हवेली से बाहर थे। इस भूकंप से उनकी हवेली के बरामदे वाला हिस्सा ही गिरा, इसलिए सास-बहू की जान बच गई। भूकंप के कारण आंतरिक रूप से यह प्राचीन हवेली जर्जर हो गई, जिसे सुरक्षा की दृष्टि से बाद में ढहा दिया गया। इसके साथ ही इनका संयुक्त परिवार भी विखंडित हो गया। इन दोनों घटनाक्रमों का अफसोस आज भी बुआ जी को है। पुरानी हवेली को वे अपनी जड़ें मानती हैं, इसलिए उससे दूर होने की टीस मन में है। इसी प्रकार अपने संयुक्त परिवार के रास्ते अलग अलग होने का मलाल भी है। उनका मानना है कि संयुक्त परिवार बंद मुट्ठी की तरह है, जिसके खुल जाने से परिवार की ताकत कमजोर हो जाती हैं। आज भले ही उनके पुत्र निवास और कारोबार के मामले में अलग अलग हैं, लेकिन बुआ जी ने उन्हें अपने ह्रदय में एक साथ जगह दे रखी हैं। वे समय के साथ चलने की पक्षधर हैं। सबकी खुशी में अपनी खुशी मानती हैं। मोबाइल फोन से भी बतियाने वाली बुआ जी अपने जीवन को भी मोबाइल रखे हुए है। उनके बुलंद हौंसले को शत शत प्रणाम। उनके दीर्घायु रहने की ईश्वर से मंगल कामनाएं।

अंजार, कच्छ स्थित मेरे देवस्थान

गुरुवार, 28 फ़रवरी 2013

अंजार, कच्छ स्थित मेरे देवस्थान


गुजरात के सरहदी जिले कच्छ के ऐतिहासिक शहर और मेरी जन्म भूमि "अंजार" में कोडराणी कुटुंब का यह देवस्थान है। मैं भी कोडराणी परिवार का एक सदस्य हूँ। कोडराणी कुटुंब के पूज्य दादा श्री खेतरपाण और कुलदेवी माँ बूटभवानी इस देवस्थान में प्रतिष्ठापित हैं। यहाँ प्रतिदिन पूजा अर्चना के अलावा हर साल वसंत पंचमी को विशेष वार्षिक पूजन महोत्सव (पेढ़ी) आयोजित किया जाता है, जो पिछले 26 साल से जारी है। देश विदेश में निवासरत कोडराणी कुटुंब के सदस्य जन इसमें सम्मिलित होते हैं। मैं भी इसमें सपत्नीक शामिल हुआ। यहाँ वसंत पंचमी को शाम छह बजे से हवन के साथ पूजा अर्चना प्रारम्भ होती है। फिर रात को महाप्रसाद के वितरण के बाद इसका समापन होता है। इस साल के पूजन यजमान राजू भाई कोडराणी (अंजार लोहाणा महाजन ट्रस्ट के अध्यक्ष और अंजार नगर पालिका के पूर्व अध्यक्ष) थे।             

मंगलवार, 1 जनवरी 2013

तेरा तुझको है अर्पित

तेरा तुझको है अर्पित 
तन-मन रहे सदा हर्षित 
मेरे हिस्से की धूप समर्पित
तेरा हर लम्हा रहे गर्वित  

मंगलवार, 11 दिसंबर 2012

दिलीप कुमार के साथ यादगार लम्हें

अभिनय सम्राट दिलीप साहब को जन्म दिन की बधाई। वर्ष 1995 में जी सिनेमा में प्रसारित धारावाहिक "अनबन" के लिए दिलीप साहब का पहला विस्तृत साक्षात्कार मुंबई के पाली हिल स्थित उनके बंगले में हमने दिन भर फिल्माया था। उसी अवसर की यह यादगार तस्वीर, जो मेरे लिए धरोहर सदृश्य है। तस्वीर में दिलीप साहब के साथ लेखक- मुख्य सहायक निर्देशक बतौर मैं और निर्माता-निर्देशक संजू सिन्हा दृष्टिगोचर हो रहे हैं।    

मायापुरी में दिलीप कुमार के साथ यादगार तस्वीर

वर्ष 1995 में टीवी चैनल "जी सिनेमा" में प्रसारित न्यूज सीरियल  "अनबन" के लिए दिलीप कुमार का पहला विस्तृत साक्षात्कार मुंबई के पाली हिल स्थित उनके बंगले में हमने दिन भर फिल्माया था। उसी अवसर की यह यादगार तस्वीर फिल्म साप्ताहिक "मायापुरी" में प्रकाशित हुई थी, जो मेरे लिए धरोहर सदृश्य है। तस्वीर में दिलीप साहब के साथ लेखक- मुख्य सहायक निर्देशक बतौर मैं, मेरे बॉस निर्माता-निर्देशक संजू सिन्हा सहित यूनिट के प्रमुख सदस्य दृष्टिगोचर हो रहे हैं।    

शुक्रवार, 30 नवंबर 2012

सोशल साइट्स पर "जला सो अल्लाह"

मेरी पहली प्रकाशित किताब "जला सो अल्लाह" (संत जलाराम बापा की जीवन-कथा) को देश-विदेश में सुधि पाठकों द्वारा सराहे जाने पर आप सभी का ह्रदय से आभारी हूँ। इस किताब को मैंने निःशुल्क सोशल साइट्स पर भी उपलब्ध कराया है। इसके सभी चालीस अध्याय फेसबुक के अलावा ट्वीटर, गूगल प्लस, गूगल रीडर और मेरे ब्लॉग "बापा की बगिया" (दिनेश ठक्कर बापा डॉट ब्लॉग स्पॉट डॉट कॉम) के जरिये भी पढ़े जा सकते हैं। ब्लॉग "बापा की बगिया" में इस किताब को अब तक देश विदेश के ढाई हजार से ज्यादा लोगों ने इसे पढ़ा है।