अभिनय सम्राट दिलीप साहब को जन्म दिन की बधाई। वर्ष 1995 में जी सिनेमा में प्रसारित धारावाहिक "अनबन" के लिए दिलीप साहब का पहला विस्तृत साक्षात्कार मुंबई के पाली हिल स्थित उनके बंगले में हमने दिन भर फिल्माया था। उसी अवसर की यह यादगार तस्वीर, जो मेरे लिए धरोहर सदृश्य है। तस्वीर में दिलीप साहब के साथ लेखक- मुख्य सहायक निर्देशक बतौर मैं और निर्माता-निर्देशक संजू सिन्हा दृष्टिगोचर हो रहे हैं।
अभिव्यक्ति की अनुभूति / शब्दों की व्यंजना / अक्षरों का अंकन / वाक्यों का विन्यास / रचना की सार्थकता / होगी सफल जब कभी / हम झांकेंगे अपने भीतर
मंगलवार, 11 दिसंबर 2012
मायापुरी में दिलीप कुमार के साथ यादगार तस्वीर
वर्ष 1995 में टीवी चैनल "जी सिनेमा" में प्रसारित न्यूज सीरियल "अनबन" के लिए दिलीप कुमार का पहला विस्तृत साक्षात्कार मुंबई के पाली हिल स्थित उनके बंगले में हमने दिन भर फिल्माया था। उसी अवसर की यह यादगार तस्वीर फिल्म साप्ताहिक "मायापुरी" में प्रकाशित हुई थी, जो मेरे लिए धरोहर सदृश्य है। तस्वीर में दिलीप साहब के साथ लेखक- मुख्य सहायक निर्देशक बतौर मैं, मेरे बॉस निर्माता-निर्देशक संजू सिन्हा सहित यूनिट के प्रमुख सदस्य दृष्टिगोचर हो रहे हैं।
शुक्रवार, 30 नवंबर 2012
सोशल साइट्स पर "जला सो अल्लाह"
मेरी पहली प्रकाशित किताब "जला सो अल्लाह" (संत जलाराम बापा की जीवन-कथा) को देश-विदेश में सुधि पाठकों द्वारा सराहे जाने पर आप सभी का ह्रदय से आभारी हूँ। इस किताब को मैंने निःशुल्क सोशल साइट्स पर भी उपलब्ध कराया है। इसके सभी चालीस अध्याय फेसबुक के अलावा ट्वीटर, गूगल प्लस, गूगल रीडर और मेरे ब्लॉग "बापा की बगिया" (दिनेश ठक्कर बापा डॉट ब्लॉग स्पॉट डॉट कॉम) के जरिये भी पढ़े जा सकते हैं। ब्लॉग "बापा की बगिया" में इस किताब को अब तक देश विदेश के ढाई हजार से ज्यादा लोगों ने इसे पढ़ा है।
बुधवार, 31 अक्टूबर 2012
पहली बार जंगल से बाहर निकल बाहरी दुनिया देखी आदिवासी विद्यार्थियों ने
छत्तीसगढ़ के अचानकमार प्रोजेक्ट टाइगर एरिया के तहत आने वाले वन ग्राम छपरवा स्थित अभ्यारण्य शिक्षण समिति हायर सेकेंडरी स्कूल के आदिवासी विद्यार्थियों को गत दिवस बस में शिवरीनारायण और सिरपुर ले जाकर वहां के पुरातात्विक स्थलों की गौरवमयी धरोहर से अवगत कराया गया. इस स्कूल के मानसेवी प्राचार्य और समाजसेवी पीडी खैरा के नेतृत्त्व में गए दल में ४६ विद्यार्थी थे, जिनमें २० छात्राएं भी शामिल थीं. इसमें कई निर्धन आदिवासी विद्यार्थी ऐसे थे, जो पहली बार वन क्षेत्र से बाहर निकल कर बाहरी दुनिया के संपर्क में आये. जंगल से बाहर आकर वे छत्तीसगढ़ के ऐतिहासिक स्थल के प्राचीन पुरा धरोहर और समृद्ध विरासत से रूबरू होकर बिलकुल नया अनुभव प्राप्त किया.
इस भ्रमण दल में कक्षा नवमीं, दसवीं और ग्यारहवीं के बीस विद्यार्थी पहली बार अपने जंगल निवास क्षेत्र से बाहर निकल कर नए और पुरा संपदायुक्त परिवेश से साक्षात्कार कर असीम आनंद और नया अनुभव प्राप्त किये . इस स्कूल के कक्षा ग्यारहवीं के मेधावी विद्यार्थी काशीराम पुरचाम,मुकेश साकेत, मनीष कंवर, बैगा छात्रा शामवती, कक्षा दसवीं की बैगा छात्रा सुनीता और कक्षा बारहवीं के छात्र अनिल कुमार की एक राय थी, कि इस तरह के भ्रमण कार्यक्रम से उनके ज्ञान में वृद्धि तो हुई साथ ही छत्तीसगढ़ की प्राचीन नगरी को देखने समझने का अवसर भी प्राप्त हुआ. इस स्कूल के शिक्षक मनीराम पनरिया, योगेश जायसवाल और चाँद सिंह पोर्ते का कहना था कि महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थलों को देखने जानने के बाद मिले अनुभव से उनके अध्यापन कार्य में विविधता और परिपक्वता आयेगी. प्राचार्य पीडी खैरा ने बताया कि राज्य की विरासत महाकोशल से पहले की है. राज्य की समृद्ध और गौरवशाली विरासत से विद्यार्थियों को अवगत कराना इस प्रवास का मुख्य उद्देश्य था. अनुभव की शिक्षा किताबी शिक्षा से बेहतर होती है. इस भ्रमण कार्यक्रम से हमने जंगल में रहने वाले ठेठ आदिवासी विद्यार्थियों को बाहरी दुनिया के संपर्क में लाकर उन्हें एक नया अनुभव मुहैया कराया है. वनांचल के शैक्षणिक जगत में यह एक अनूठा प्रयोग भी है. इसे सरकार को व्यवहार में लाकर आत्मसात करना चाहिए. पीडी खैर ने बताया कि यह भ्रमण कार्यक्रम बायोस्फियर क्षेत्र के डीएफओ बीपी सिंह ने प्रायोजित किया था.
-दिनेश ठक्कर
(दैनिक भास्कर भूमि, राजनांदगांव में प्रकाशित)
-दिनेश ठक्कर
(दैनिक भास्कर भूमि, राजनांदगांव में प्रकाशित)
रविवार, 2 सितंबर 2012
"पानी वही बचा सकता है, जिसकी आँखों में पानी हो"
पानी की कमी के कारण आज छत्तीसगढ़ के लोग मजदूरी करने अन्य राज्यों में पलायन कर रहे हैं. उनके खेतों को पानी नहीं दिया जा रहा है. औद्योगिक घरानों के यहाँ आने से पानी का अभाव पैदा हुआ है. औद्योगिकरण के बाद भी मजदूरी के लिए गरीब छत्तीसगढ़वासियों को राज्य से बाहर जाना पड़ रहा है. यह विचार शनिवार को पूर्व सांसद और गांधीवादी चिन्तक केयूर भूषण ने व्यक्त किये. वे होटल सेन्ट्रल पाइंट, बिलासपुर में राष्ट्रीय जल नीति २०१२ पर आयोजित दो दिवसीय संगोष्ठी में मुख्य अतिथि थे.ऑल इंडिया प्रोग्रेसिव फोरम की छत्तीसगढ़ इकाई के तत्वावधान में आयोजित इस संगोष्ठी के प्रथम सत्र में केयूर भूषण ने कहा कि आदिवासियों की जमीन औद्योगिक घरानों को दिए जाने जैसी बातों का राष्ट्रीय जल नीति के प्रारूप में विचार होना चाहिए. मुख्य वक्ता संजय विश्वास का कहना था कि सहज रूप से पानी प्राप्त करना मनुष्य का अधिकार है. जबकि औद्योगिक घरानों ने पानी को एक बिकाऊ मॉल बना दिया है. पानी के निजीकरण और व्यवसायीकरण से औद्योगिक घराने अंधाधुंध मुनाफ़ा कमा रहे हैं. इससे पानी महँगा हो गया है. आगे चलाकर पानी आम आदमी के लिए दुर्लभ हो जाएगा.
वक्ता अनिल राजिमवाले ने कहा कि पानी उस जड़ का काम करता है जिसके बिना संस्कृति का विकास नहीं होता. दुःख की बात है कि पानी से धन कमाने वालों को पूरी छूट मिली हुई है. गौतम बंदोपाध्याय ने कहा कि पानी की चर्चा हमारी सांस्कृतिक धरोहर की चर्चा है. पानी का बाजारीकरण करना ठीक नहीं है. पानी वही बचा सकता है जिसकी आँखों में पानी हो. तभी पानीदार समाज की कल्पना की जा सकती है. पहले सत्र के समापन पर राज्य संयोजक चितरंजन बख्शी ने भावी योजनाओं की जानकारी दी. स्वागत भाषण महापौर श्रीमती वाणी राव ने दिया. संचालन वरिष्ठ पत्रकार नथमल शर्मा ने किया. इस अवसर पर शहर के प्रबुद्ध जन उपस्थित थे.
वक्ता अनिल राजिमवाले ने कहा कि पानी उस जड़ का काम करता है जिसके बिना संस्कृति का विकास नहीं होता. दुःख की बात है कि पानी से धन कमाने वालों को पूरी छूट मिली हुई है. गौतम बंदोपाध्याय ने कहा कि पानी की चर्चा हमारी सांस्कृतिक धरोहर की चर्चा है. पानी का बाजारीकरण करना ठीक नहीं है. पानी वही बचा सकता है जिसकी आँखों में पानी हो. तभी पानीदार समाज की कल्पना की जा सकती है. पहले सत्र के समापन पर राज्य संयोजक चितरंजन बख्शी ने भावी योजनाओं की जानकारी दी. स्वागत भाषण महापौर श्रीमती वाणी राव ने दिया. संचालन वरिष्ठ पत्रकार नथमल शर्मा ने किया. इस अवसर पर शहर के प्रबुद्ध जन उपस्थित थे.
राष्ट्रीय जल नीति के नए मसौदे पर बिलासपुर में भी बहस की शुरूआत होना अच्छा संकेत है.आम आदमियों से राष्ट्रीय जल नीति का गहरा नाता है. जल है तो जीवन है, यह जुमला इंसान के भी अस्तित्व से जुड़ा हुआ है.पानी क्या केवल एक प्राकृतिक संसाधन है अथवा जीवन के निरंतर विकास का मूलाधार है, इस बात पर भी विद्वतजनों की बहस सामाजिक सरोकार की तरफ इशारा करती है. ऑल इंडिया प्रोग्रेसिव फोरम से जुड़े जल नीति विशेषज्ञ के. सोमन ने अपने शोधपरक पर्चे में खुलासा किया है कि "नई नीति में जल की उपलब्धता का उल्लेखित डाटा वही है, जो २००२ की राष्ट्रीय नीति में भारत की भौगोलिक सीमाओं के भीतर है. जो १९९३ के आंकलन पर आधारित है. यद्दपि नई नीति बदलते जलवायु परिदृश्यों में तथा अन्य तथ्यों की आवश्यकता की बात करती है. किन्तु जल संसाधन में तेजी से आते भूमंडलीय परिवर्तन के देश के जल परिदृश्य पर ठोस और निर्णयात्मक विचार करने का प्रयास करती नहीं दिखाई देती है. बाहरी और स्थानीय जलवायु परिवर्तनों के अंतर्संबंधों की भी सुविधानुसार उपेक्षा की गई है. नई नीति भूगर्भीय जल को लोक संपदा के रूप में देखने पर आपत्ति जताती है. इसमें मांग आधारित सेवा दी जाने की वकालत करने के साथ विभेदाकारी टैरिफ के प्रस्ताव हैं. किसी गरीब को जीवन सहायक या राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा की पूर्ति कैसे होगी, यह मसौदे में वर्णित नहीं किया गया है. यह नीति जल को एक आर्थिक उत्पाद मानते हुए इसके प्रभावशाली कीमत की वकालत करती है". के. सोमन अपने पर्चे में यह भी लिखते हैं कि "जल लोगों का मूल अधिकार है न कि बेचे जाने वाली और व्यावसायिक चीज. मानव, पशु-पक्षी और पौधों के लिए जल वरदान है. इस पर इनका अधिकार है. जल नीति राष्ट्र के भौगोलिक, ऐतिहासिक, अलग अलग क्षेत्रों की मिट्टी की विविधताओं और उसके भूजल के स्तर डाटा के संबंधों और सामान्य औसत वर्षा तथा वैज्ञानिक आधार पर हो". बहरहाल, बिलासपुर की तरह छोटे शहरों और गाँवों में भी राष्ट्रीय जल नीति पर सार्थक चर्चा और बहस होनी चाहिए, जिससे जल जैसे उपयोगी ज्वलंत मुद्दे पर आम आदमी की भी सहभागिता बढ़े.
शनिवार, 1 सितंबर 2012
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