अभिव्यक्ति की अनुभूति / शब्दों की व्यंजना / अक्षरों का अंकन / वाक्यों का विन्यास / रचना की सार्थकता / होगी सफल जब कभी / हम झांकेंगे अपने भीतर

मंगलवार, 9 अप्रैल 2013

आदि ज्योतिर्लिंग श्री सोमनाथ महादेव


यत्र गंगा च यमुना च।
यत्र प्राची सरस्वती।
यत्र सोमेश्वरो देवः।
तत्र माममृतं कृधि।
इन्द्रायेन्दो परिस्त्रव।
(ऋग्वेद खिलसूक्त)       

रविवार, 7 अप्रैल 2013

हनुमान जी जीवन प्रबंधन के गुरू हैं- पं. मेहता

जीवन के हर क्षेत्र में स्थितियों और समस्याओं से कैसे निपटा जाए ,हनुमान जी का चरित्र हमें यह सिखाता है। वे श्रीराम के परम भक्त हैं। हनुमान जी जीवन प्रबंधन के गुरू हैं। जब हम हनुमान जी को अपने जीवन में उतारते हैं तो हम भी भक्त होने लगते हैं और भौतिक समस्याओं के निराकरण में भक्त की अपनी विशिष्ट शैली होती है। यह विचार शनिवार की शाम को बिलासपुर, छत्तीसगढ़ के श्याम मंदिर भवन में  जीवन प्रबंधन गुरु पं विजय शंकर मेहता ने बातचीत के दौरान व्यक्त किए। 
पं मेहता ने एक प्रश्न के जवाब में कहा कि आज के समय में हर कार्य को संक्षेप , शीघ्रता और दक्ष होकर करने की उम्मीद  की जाती है।  गोस्वामी तुलसीदासजी ने हनुमान चालीसा नामक ऐसा ही  सक्षिप्त साहित्य लिखा है जिसका पाठ 3 से 5 मिनट में पूरा हो जाता है। हनुमान चालीसा के माध्यम से ध्यान करने पर जीवन अलग ही दिव्य रूप ले लेता है। हनुमान चालीसा की प्रत्येक पंक्ति में जीवन की हर समस्या का समाधान निहित है। ऐसा इसलिए है कि इसके हर शब्द में हनुमानजी स्वयं अवतरित हुए हैं। हनुमान चालीसा का पाठ करने से व्यक्ति की परेशानी , अशांति और असफलता दूर हो जाती है। 
हनुमानजी का जीवन प्रबंधन से क्या वास्ता है? इस सवाल पर उन्होंने कहा कि हनुमानजी का जीवन चरित्र ,उनका हर काम नियोजित रहता था। आज के दौर में व्यक्ति के जीवन में हनुमानजी का जीवन चरित्र आगे बढ़ने में बेहद सहायक है। उन्होंने कहा कि मनुष्य किसी भी क्षेत्र का हो उसे ज्ञान, कर्म और उपासना के मार्ग पर चलने से ही लक्ष्य की प्राप्ति होगी। 
"हमारे हनुमान" और "एक शाम हनुमान के नाम" जैसे अपने आध्यात्मिक कार्यक्रमों  के राजनीतिकरण के सवाल पर उन्होंने स्पष्ट किया कि यह आरोप बेबुनियाद है। आयोजक किसी भी वर्ग या पार्टी विशेष का हो ,यह मायने नहीं रखता। हम तो उसी घाट पर जाते हैं जहाँ शेर और बकरी दोनों पानी पीने  आते हैं। मेरा प्रयास रहता है कि आध्यात्मिक कार्यक्रमों  के जरिए शांति स्थापित हो।पाकिस्तान में भी मैंने अपने आख्यान में मजहब को जिस्मानी और रूहानी तौर पर अलग-अलग उपयोग के साथ समझाया था। हनुमानजी और ध्यान  के उदहारण के साथ उन्होंने बताया कि बिना ख्यालात के सांस लेने पर अपने इष्ट से रूहानी जुडाव संभव है। वैज्ञानिकों द्वारा गॉड पार्टिकल्स की खोज के सम्बन्ध में उन्होंने बताया कि धर्म और आध्यात्म अनुभूति का मामला है जबकि विज्ञानं प्रमाण मांगता है। सभी धर्मों में अपने अपने इष्ट की प्रार्थना का चलन है और प्रार्थना ही ईश्वर से मिलाने का एकमात्र माध्यम है। वैज्ञानिक  इसी प्रार्थना से ईश्वर के अंश तलाश करने की जुगत में हैं। फिल्मों और टीवी सीरियल में हनुमानजी के किरदार को न्याय की कसौटी पर तौलते हुए उन्होंने कहा कि निर्देशक तो थोड़ी-बहुत छूट ले सकता है लेकिन हनुमानजी के जीवन चरित्र के साथ खिलवाड़ नहीं करना चाहिए। 
पत्रकार वार्ता के बाद रात नौ बजे तक गुजराती समाज भवन टिकरापारा में पं मेहता ने अपने आख्यान में हनुमानजी के जीवन चरित्र पर प्रकाश डालते हुए जीवन प्रबंधन के गुर बताए। उल्लेखनीय है कि पं मेहता की मौजूदगी में रामनवमीं ( 19 अप्रैल) की संध्या 7 से 8 बजे की बीच रायपुर के पुलिस ग्राउंड में श्रीहनुमानचालीसा के सवा करोड़ जप का महायोजन राज्य स्तर पर एक ही समय में  किया जाएगा जिसका प्रसारण  आस्था चैनल के जरिए होगा।  इस बार पं मेहता के महापाठ  का विषय राष्ट्रीयता का बोध होगा  जिसमें धर्म और नैतिकता को अपनाने और भ्रष्टाचार तथा अपराध को नकारने पर जोर दिया जाएगा।
-दिनेश ठक्कर
(दैनिक भास्कर भूमि, राजनांदगांव में प्रकाशित)  

शनिवार, 30 मार्च 2013

धर्मयुग में ताला के रूद्र शिव की प्रतिमा पर आलेख

तालागांव में उत्खनन के बाद प्राप्त रूद्र शिव की दुर्लभ प्रतिमा पर मेरी समीक्षात्मक रपट राष्ट्रीय स्तर पर सर्वप्रथम द टाइम्स ऑफ इंडिया ग्रुप की जानी मानी साप्ताहिक पत्रिका "धर्मयुग", मुंबई के 25 सितम्बर1988 के अंक में प्रकाशित हुई थी। यह अंक और रपट की कतरन मेरे लिए धरोहर स्वरूप है।

ताला के रूद्र शिव की दुर्लभ प्रतिमा के संग

शिवमय स्मृति ... छत्तीसगढ़ के तालागांव में उत्खनन के बाद प्राप्त रूद्र शिव की दुर्लभ प्रतिमा के समक्ष मैं और पत्रकार मित्र सर्वश्री प्राण चड्डा, नथमल शर्मा और सीतेश द्विवेदी।

नवभारत के होली समारोह की यादें

नवभारत, बिलासपुर में बतौर उप सम्पादक के अपने कार्यकाल के दौरान वर्ष 1986 में होली मिलन समारोह के वक्त प्रेस के समस्त साथियों के संग यादगार पल।

बुआ जी का बुलंद हौंसला




मेरे पिताजी स्वर्गीय श्री केशव लाल ठक्कर की बुआ जी 97 वर्षीय श्रीमती राम बेन कोठारी के हौंसले आज भी बुलंद हैं। वे गुजरात के सरहदी जिले कच्छ के शहर अंजार के रामकृष्ण महावीर नगर स्थित मकान में अपने दूसरे पुत्र श्री देवसी भाई के साथ निवासरत हैं। वे अपने कपडे, बर्तन धोने से लेकर सभी दैनिक कार्य बिना किसी की मदद लिए खुद करती हैं। अंजार में रहने वाले अपने अन्य पुत्रों-पुत्री, नाती-पोतों से मिलने उनके घर अक्सर वे अकेली ही ऑटो रिक्शा में बैठ कर निकल पड़ती हैं। यह मेरा सौभाग्य है कि बचपन से ही मुझे उनका स्नेह और आशीर्वाद मिलता रहा है। उनकी खुद्दार जीवन शैली से मुझे सदैव प्रेरणा मिलती रही है। 97 वसंत देख चुकी बुआ जी का सानिध्य अंजार में इस वसंत पंचमी को दिन भर मिला। उतार चढाव भरी उनकी जिन्दगी के यादगार लम्हों के संस्मरण की आधे घंटे की वीडियो रिकार्डिंग करने का भी सुअवसर मिला। अंजार में आये दिन भूकंप के झटके महसूस होते रहते हैं, लेकिन बुआ जी इससे बिलकुल नहीं घबराती हैं। वे अंजार में अब तक आये दो बड़े भूकंप की त्रासदी झेल चुकी हैं।21 जुलाई 1956 और 26 जनवरी 2001 को सुबह अंजार समेत कच्छ में आये विनाशकारी भूकंप से जड़ी त्रासदी को वे आज भी नहीं भूली हैं। हालांकि दोनों बार वे सकुशल रहीं। 26 जनवरी 2001 को सुबह जब भूकंप आया तब वे अंजार के गंगा नाका स्थित अपनी पुरानी हवेली के स्नान गृह में थीं। जबकि उनकी बड़ी बहू लीलावन्ती बेन रसोई घर में थी। संयुक्त परिवार के बाकी सदस्य हवेली से बाहर थे। इस भूकंप से उनकी हवेली के बरामदे वाला हिस्सा ही गिरा, इसलिए सास-बहू की जान बच गई। भूकंप के कारण आंतरिक रूप से यह प्राचीन हवेली जर्जर हो गई, जिसे सुरक्षा की दृष्टि से बाद में ढहा दिया गया। इसके साथ ही इनका संयुक्त परिवार भी विखंडित हो गया। इन दोनों घटनाक्रमों का अफसोस आज भी बुआ जी को है। पुरानी हवेली को वे अपनी जड़ें मानती हैं, इसलिए उससे दूर होने की टीस मन में है। इसी प्रकार अपने संयुक्त परिवार के रास्ते अलग अलग होने का मलाल भी है। उनका मानना है कि संयुक्त परिवार बंद मुट्ठी की तरह है, जिसके खुल जाने से परिवार की ताकत कमजोर हो जाती हैं। आज भले ही उनके पुत्र निवास और कारोबार के मामले में अलग अलग हैं, लेकिन बुआ जी ने उन्हें अपने ह्रदय में एक साथ जगह दे रखी हैं। वे समय के साथ चलने की पक्षधर हैं। सबकी खुशी में अपनी खुशी मानती हैं। मोबाइल फोन से भी बतियाने वाली बुआ जी अपने जीवन को भी मोबाइल रखे हुए है। उनके बुलंद हौंसले को शत शत प्रणाम। उनके दीर्घायु रहने की ईश्वर से मंगल कामनाएं।

अंजार, कच्छ स्थित मेरे देवस्थान