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सोमवार, 1 जुलाई 2013

सरगुजा के उपेक्षित पुरातात्विक स्थल

 इतिहास पर जमती उपेक्षा की परतें 
पुरा- संपदा की दृष्टि से आदिवासी जिला सरगुजा अत्यंत संपन्न है, लेकिन इसकी सुधि लेने वाला कोई नहीं हैं। सैकड़ों वर्ष पुरानी पाषाण- प्रतिमाएं यत्र-तत्र उपेक्षित पड़ी हैं। कुछ महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थलों का औपचारिक सर्वेक्षण करवा कर शासन ने अपना फर्ज पूरा कर लिया, पर दुर्लभ मूर्तियों के संग्रह- संरक्षण के लिए अब तक कोई कारगर पहल नहीं की गयी है। जिले में महत्वपूर्ण प्रतिमाओं की चोरी और प्रशासन की निष्क्रियता ने मूर्तियों की तस्करी का क्रम बदस्तूर जारी रखा है।
रामगढ़ की प्राचीन रंगशाला, महेशपुर, देवगढ़- सतमहला तथा डीपाडीह की पुरा- संपदाएं देश में महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं। किंतु घोर उपेक्षा की वजह से ये धीरे- धीरे अपना अस्तित्व खो रहीं हैं। बिलासपुर- अंबिकापुर मार्ग पर स्थित रामगढ़ पहाड़ी पर जोगीमारा सीता बेंगरा गुफाएं हैं। जोगीमारा गुफा में ईसा पूर्व द्वितीय सदी का एक अभिलेख है, जिसमें सूतनका नामक नर्तकी एवं देवदत्त नामक रूपदक्ष के प्रणय- प्रसंग का उल्लेख किया गया है। इस गुफा की छत में रंगीन भित्ति चित्र भी हैं, जिनमें रथ, अश्व, गज और विभिन्न भावभंगिमाओं को प्रदर्शित करते हुए मानव का चित्रण किया गया है।
कहा जाता है कि भारत के ज्ञात ऐतिहासिक काल का यह सर्वाधिक प्राचीन भित्ति चित्र है। वे भित्ति चित्र अजंता, एलोरा के प्रख्यात भित्ति चित्रों से पहले के बने हुए बताये जाते हैं। उल्लेखनीय है कि इन चित्रों के निर्माण में लाल, गेरुआ, कत्थई, हरे एवं नीले रंगों का उपयोग किया गया था। यह जानकारी इन चित्रों के बचे-खुचे अंश से प्राप्त होती है। शासन की लापरवाही का नतीजा यह है कि यहां के चित्र संरक्षण के अभाव में अत्याधिक धूमिल एवं क्षरित हो गये हैं।
हर बार उपेक्षा की मार 
रामगढ़- जोगीमारा में मौर्यकालीन ब्राह्मी लिपि में उत्कीर्ण एक अभिलेख से इस क्षेत्र की ऐतिहासिक परंपरा का श्रीगणेश मौर्यकाल से हो जाता है। धार्मिक किंवदंतियों में रामगढ़ को रामायणकालीन प्रसंगों से जोड़ा जाता है। ऐसी मान्यता है कि राम ने अपने वनवास की अवधि में इसी स्थल पर निवास किया था। इसके पश्चात उन्होंने दक्षिण दिशा में प्रस्थान किया। दूसरी ओर रामगढ़ की भौगोलिक स्थिति कालिदास द्वारा रचित मेघदूत के अनेक संदर्भों से भी मेल खाती है। पुरातात्विक दृष्टि से इतना महत्वपूर्ण स्थान होने के बावजूद राज्य सरकार रामगढ़ की नाट्यशाला में औपचारिक तौर पर 365 दिन में एकाध कार्यक्रम आयोजित कर इसके महत्व का अहसास कराती है, जबकि इसके संरक्षण तथा विकास की दिशा में पहल नगण्य है।
रामगढ़ की पहाड़ियों की तलहटी में तथा रेण नदी के तट पर स्थित महेशपुर भी इस समय उपेक्षा की मार सह रहा है। इस गांव में आठवीं-नवीं शताब्दी के 10 मंदिरों के भग्नावशेष हैं। इन ध्वंसावशेषों में शिवलिंग, विष्णु, त्रिविक्रम, नृसिंह, गणेश, दिग्पाल, नदी देवी गंगा- यमुना, अलंकृत स्थापत्य खंड एवं द्वार- शाखा के अवशेष प्रमुख हैं। तत्कालीन राजवंशियों (त्रिपुरी कलचुरी) के द्वारा रेण नदी के तट पर अनेक महत्वपूर्ण मंदिरों का निर्माण करवाया गया था। वैसे आठवीं शताब्दी के मंदिरों (भग्नावशेष) से संबंधित पर्याप्त साक्ष्य प्राप्त नहीं होने से मंदिर के कर्ताधर्ता राजवंशों के बारे में निश्चित रूप से कोई राय नहीं बन पायी है। लगभग तीन हजार की आबादी वाले इस आदिवासी बाहुल्य ग्राम में अधिकांश मंदिरों के भग्नावशेषों तथा स्थिति से ऐसा प्रतीत होता है कि प्राचीनकाल में यह तीर्थ स्थल के रूप में विख्यात तो रहा होगा, साथ ही एक प्रमुख नगर भी रहा होगा। यह भी अनुमान लगाया जा रहा है कि यहां विभिन्न धर्मों के अनुयायी निवास करते रहे होंगे।
शेष बचे अवशेष
भौगोलिक स्थिति से यह भी स्पष्ट होता है कि उत्तर एवं पूर्वी भारत से आने वाले तीर्थ यात्री रेण नदी से होते हुए सोन नदी के तट और अमरकंटक आते रहे होंगे। महेशपुर में दो शिव मंदिरों के खंडहर तथा ऐतिहासिक महत्व के दस टीलों को इन दिनों सर्वाधिक संरक्षण की आवश्यकता है। समीपस्थ स्थल लक्ष्मणगढ़ भी उपेक्षा का अभिशाप भोग रहा है। जबकि यहां एक शिल्प पट्ट में कृष्ण लीला से संबंधित दृश्यों का अंकन मिलता है, जो अपने आप में महत्वपूर्ण हैं। इस पट्टे में विशेषकर कृष्ण जन्म एवं पूतना वध प्रसंग अत्याधिक स्पष्ट है।
पुरातत्वीय महत्ता के हिसाब से देवगढ़- सतमहला भी मुख्य स्थल है। उदयपुर-सूरजपुर मार्ग तथा रेण नदी के तट पर स्थित यह प्राचीन मंदिरों का एक समूह है। देवगढ़ में शिव मंदिर के अवशेष हैं, जिनमें एकमुखी लिंग उल्लेखनीय है। प्राचीन मंदिरों में गंगा-यमुना, गणेश, कार्तिकेय मंदिर के अलावा खंडित प्रतिमाएं विशेष महत्व की हैं। कहा जाता है कि सतमहला में पहले मंदिर कुछ ज्यादा थे। उस काल में तत्कालीन नगर भी बसा हुआ था। फिलहाल, यहां पर तीन समूहों में करीब पांच मंदिरों के टीले हैं । इन टीलों में गंगा- यमुना प्रतिमा एवं शिवलिंग आदि रखे हुए हैं। इन मंदिरों के निकट प्राचीन काल की एक बावड़ी भी है। भग्नावशेषों से ऐसा लगता है कि इन मंदिरों का निर्माण सातवीं- आठवीं शताब्दी में हुआ होगा। दुर्भाग्य से इनकी भी देखरेख करने वाला कोई नहीं है।
यही हाल डीपाडीह का भी है। डीपाडीह एक प्राचीन स्थल है, जो अंबिकापुर- कुसमी मार्ग में कन्हर नदी के तट पर स्थित है। यहां भी अनेक मंदिरों के भग्नावशेष हैं। इनमें गंगा- यमुना, शिव, भैरव, नंदी, गणेश, महिषासुरमर्दिंनी आदि की प्रतिमाएं रखी हुई हैं। खास बात यह है कि यहां के टीले आकार में विशाल तथा विस्तृत हैं। यहां के मंदिरों के निर्माण में भी ईंट व प्रस्तरों का साथ-साथ उपयोग किया गया है।
कौन करे पहल?
प्राप्त अवशेषों से मालूम होता है कि यहां के मंदिरों का निर्माण आठवीं- नवीं शताब्दी में करवाया गया होगा। टीलों का उत्खनन, सफाई आदि करवायी जाये, तो मंदिरों की संरचना और काल का सही निर्धारण हो सकता है। ज्ञातव्य है कि एक किलोमीटर के क्षेत्र में छह मंदिरों के भग्नावशेष हैं, लेकिन भारतीय पुरातत्वीय सर्वेक्षण विभाग और राज्य पुरातत्वीय सर्वेक्षण विभाग द्वारा रामगढ़ को छोड़ सरगुजा जिले के मुख्य स्थलों की तरह इसका भी पुरातात्विक सर्वेक्षण आज तक पूर्ण नहीं किया गया है, न ही जिले का गजेटियर प्रकाशित हुआ है।
सरगुजा जिले की भौगोलिक स्थिति, पर्यावरणीय वनस्पति तथा जनजातियों के अध्ययन से इस क्षेत्र की संस्कृति रामायणकालीन घटनाओं से आबद्ध किये जाने की परंपरा में निश्चित ही किसी महत्वपूर्ण सूत्र अथवा घटना का कुछ-न-कुछ अंश सन्निहित होगा, जिस पर अध्येताओं एवं विद्वानों का ध्यान तथा शोध कार्य आवश्यक है ताकि छत्तीसगढ़ की गौरवशाली ऐतिहासिक परंपरा सिर्फ सिरपुर, अड़भार, ताला, खरौद तथा मल्हार या कहें कि केवल महानदी- शिवनाथ नदी के तट तक  सीमित न रह कर रेण-सोन नदी के तट तक भी विस्तृत हो सके। 
 - दिनेश ठक्कर
(31 जनवरी 1988 को पत्रिका धर्मयुग, मुंबई में प्रकाशित)

शुक्रवार, 21 जून 2013

मौत का जल






























आस्था का बढ़ा विनाशी भ्रमण
हथेली पर लिए चले प्राण
स्वार्थों का बढ़ा अतिक्रमण
खुद खाई खोदने का लिया प्रण

मानव की बढ़ी बेहद मनमानी
तिजारती इमारतें उसने तानी
देवभूमि की महत्ता न जानी
प्रकृति ने सबक सिखाने ठानी

अंबर को भी गुजरा यह नागवार
आँखें तरेरता आक्रोशित अंबर
चेतावनी की बूंदों का हुआ न असर
फटे आफत के बादल गरजदार
आया मौत का जल जोरदार

गिरी आस्था की निष्ठुर चट्टानें
धंसी मोक्ष की जिन्दगी रूलाने
मलबे में दबी काया लगी झांकने
मुसीबतों का पहाड़ लगा सताने

केदारनाथ बचे धाम हुआ अनाथ
शिवमूर्ति को गंगा ले गई साथ
बौराई मंदाकिनी का बना रौद्र पथ
काल की धारा में बहे सब खाली हाथ

अपनों की आँखों से बहती अश्रु गंगा
रिश्तों के दर्द का उफान कम न होगा
संबंधों की देह का इन्तजार रहेगा
भोले शंकर पर भरोसा कम न होगा

सिकेंगी अब भावनाओं की रोटी
सुनाई जाएगी परस्पर खरी-खोटी
नोंच खाएंगे बदनीयत बोटी-बोटी
राहत आपस में ही जाएगी बांटी

@ दिनेश ठक्कर "बापा"
(फोटो उत्तराखंड-फेसबुक से साभार)






   

गुरुवार, 20 जून 2013

चुभता एक नश्तर

सोमनाथ के समुद्र तट पर
आस्था की लहरों से सराबोर
आस्तिक थपेड़ों से तरबतर
फिर भी चुभता एक नश्तर
इंसान बेहतर या जानवर
किसका व्यवहार बेहतर
नन्दीश शंकर ही देंगे प्रत्युत्तर

(फोटो : श्रीमती प्रीति ठक्कर) 


रविवार, 16 जून 2013

कराते चैम्पियन दादी बलसारा से भेंटवार्ता धर्मयुग में

इनके पेट के नाजुक हिस्से के ऊपर से कार गुजर सकती है! यह इनका विश्व- कीर्तिमान हैं। ये जब मेज पर खड़ी बोतल की गर्दन पर हाथ से वार करते हैं, तो बोतल का ऊपरी हिस्सा चूर-चूर हो जाता है, पर बोतल वहीं खड़ी-की-खड़ी रहती है! यह काम दुनिया में सिर्फ चार व्यक्ति ही कर सकते हैं। बर्फ की 65 पौंड वजन वाली आठ सिल्लियों को ये अपने माथे के एक ही झटके से तोड़ सकते हैं ! यह दक्षिण- पूर्व एशिया का कीर्तिमान है। 65 पौंड वजन वाली बर्फ की छह सिल्लियों को ये कोहनी के एक ही वार से तोड़ सकते हैं। आग में तपते टाइल्स के  गट्ठर को माथे या कोहनी के एक प्रहार से टुकड़े- टुकड़े कर सकते हैं। हाथ में पैनी धार वाली तलवार पकड़ कर और उसके मध्य भाग में सेब टिका कर अगर कोई खड़ा हो, तो ये दूर से दौड़ कर आयेंगे, दाहिने पांव के अंगूठे से एक सधा हुआ वार करेंगे और सेब के दो टुकड़े हो जायेंगे!
ये हैं "क्यो-कुशिन कराते" के बेताज बादशाह 38 वर्षीय कोलकाता निवासी शिहान दादी बलसारा। फोर्थ डेन ब्लैक बेल्टधारी बलसारा इस जापानी कराते संस्था "क्यो- कुशिन काई कान" की भारतीय शाखा के अध्यक्ष, निदेशक और प्रमुख नियंत्रक हैं। ये दक्षिण- पूर्व एशिया कराते फेडरेशन के उपाध्यक्ष भी हैं। ये कराते की अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भारतीय दल के प्रतिनिधि एवं निर्णायक मंडल के सदस्य भी रह चुके हैं। कोलकाता स्थित इनके प्रशिक्षण केंद्र में 3 वर्ष से लेकर 82 वर्ष तक की उम्र के प्रशिक्षार्थी हैं। इनमें दक्षिण अफ्रीका, अफगानिस्तान, पाकिस्तान तथा श्रीलंका के लोग भीं हैं। युवतियां भी हैं। नेत्रहीन और विकलांग भी। 
कराते के फायदे
दादी बलसारा को वर्ल्ड क्यो कुशिन कराते फेडरेशन, जापान की तरफ से "शिहान" तथा "रेन्सी" जैसी उच्चतम उपाधियां मिली हुई हैं। उन्हें "शिबुचो" की पदवी भी मिली है, जो किसी राष्ट्र के सिर्फ एक ही व्यक्ति को दी जाती है। "शिबुचो" टाइटिलधारी किसी योग्य प्रशिक्षार्थी को थर्ड डिग्री ब्लैक बेल्ट तक की पदवी दे सकते हैं। "क्यो कुशिन कराते" की विधा के प्रसार के लिए जिन दो व्यक्तियों को "एंब्लेम ऑफ मेरिट ट्राफी" दी गयी है, दादी बलसारा उनमें से एक हैं और अब वे कराते के अपने इन्हीं रोमांचक कारनामों पर आधारित  हिंदी एवं अंग्रेजी की कुछ फिल्मों में बतौर नायक अभिनय भी कर चुके हैं। उनसे बातचीत कुछ यों शुरू हुई:-
0 कराते के क्षेत्र में आने की प्रेरणा आपको कहां से मिली?
-14 वर्ष की उम्र से ही मैं इसमें रुचि लेने लगा था। ग्रैंड मास्टर कांचो मॉस ओयामा की कराते संबंधी किताबों के अध्ययन से मेरी दिलचस्पी और बढ़ी। जब मैं नौसेना में अधिकारी था, तब मुझे विश्व के अनेक कराते प्रशिक्षण केंद्रों में जाने का अवसर मिला। पहले मैंने "कुंग-फू" अर्थात नॉन कांटैक्ट कराते में दक्षता हासिल की। पर बाद में मुझे "क्यो कुशिन" या फुल कांटैक्ट कराते उससे श्रेष्ठ प्रतीत हुआ। मैंने नौकरी छोड़ दी और सारा जीवन इसी कराते को समर्पित कर दिया। मुझे जापान आमंत्रित किया गया और वहीं मैंने ये सारी उपाधियां हासिल कीं।
0 कराते से फायदा क्या है?
- अहिंसा और निर्भीकता पर आधारित यह सर्वोत्तम द्वंद्व- कौशल है। इससे अपनी तथा दूसरों की रक्षा की जा सकती है। शारीरिक एवं मानसिक विकास होता है और फुर्ती आती है।
हम निहत्थे लड़ते हैं
0 "क्यो कुशिन काई कान" तथा विश्व में प्रचलित कराते के अन्य संगठनों में क्या फर्क हैं?
- इंटरनेशनल कराते ऑर्गनाइजेशन "क्यो कुशिन काई कान" की तकनीकी पद्धति, नियमावली एवं विचारधारा "विश्व यूनियन ऑफ कराते फेडरेशन" तथा जे.के. ओ. से सर्वथा भिन्न है। हालांकि ये सभी जापानी पद्धति पर आधारित हैं, पर हमारा क्यों कुशिन फुल कांटैक्ट स्ट्रांग कराते है, जबकि बाकी दोनों नॉन कांटैक्ट स्पोर्ट्स कराते हैं। उनकी विधा में शरीर के कई हिस्सों पर प्रहार वर्जित होता है। वे हथियारों का इस्तेमाल भी करते हैं। वे सिर्फ सार्वजनिक प्रदर्शन के माध्यम से मनोरंजन ही कर सकते हैं। प्रतियोगिता एवं सुरक्षा की दृष्टि से उनकी कोई सार्थकता नहीं होती, जबकि हम खाली हाथ से प्रहार करते हैं, अपनी रक्षा भी करते हैं और अंतर्राष्ट्रीय मुकाबलों में अव्वल भी आते हैं।
0 बाकी दोनों संगठनों के कार्यकलापों के प्रति आपका क्या दृष्टिकोण है?
- वे लोग कराते के आदर्श से विमुख हो कर प्रशिक्षाथियों को गुमराह कर रहे हैं। उन संगठनों ने पिछले आठ साल के दौरान अपनी खामियां दूर नहीं कीं। इसी वजह से हम विश्व- कराते के भविष्य के प्रति चिंतित भी रहते हैं। ये दूसरे संगठन कराते को अपने धन के माध्यम से चला रहे हैं, न कि वास्तविक पद्धति से। तभी तो इन संगठनों के प्रशिक्षार्थी कराते प्रतियोगिता में ज्यादा सफल नहीं हो पाते।
0 कराते प्रशिक्षार्थी को विभिन्न ग्रेड के बेल्ट प्रदान करने का क्या तरीका है?
- कराते के दस निम्न तथा पांच उच्च एवं डेन वर्ग होते हैं। जब कोई कराते सीखना शुरू करता है, तब वह दसवें "क्यू क्लास" का प्रशिक्षार्थी कहलाता है। उसे व्हाइट बेल्ट दिया जाता है। अभ्यास- परीक्षण के बाद उसे ब्ल्यू बेल्ट का ग्रेड दिया जाता है। फिर येलो, ग्रीन, ब्राउन और अंत में ब्लैक बेल्ट दिया जाता है। अब उसे बुनियादी प्रशिक्षण मिल चुका होता है। यहां तक पहुंचने में उसे तीन से चार वर्ष लगते हैं। अब वह प्रथम श्रेणी ब्लैक बेल्ट से शुरू करके पांचवे डैन तक जा सकता है। यह ब्लैक बेल्ट की अंतिम डिग्री होती है। तीसरी श्रेणी के ब्लैक बेल्टधारी होने में 15-16 वर्ष तक का समय लग जाता है।
भारत में "क्यो कुशिन"
0 क्यो कुशिन कराते पद्धति की शुरुआत कैसे हुई और आज इसकी स्थिति क्या है?
- यों तो सामान्य कराते का उद्भव वर्ष 1610 के आसपास माना जाता है। किंतु वर्ष 1900 के बाद जापान के फूनाकोशी गीथीन ने इसमें अनेक परिवर्तन किये। वे ही आधुनिक कराते के जनक कहलाते हैं। इसके अलावा आज संसार में "शोतोकान", "शीतोरू" "गूजूकाई", "वादोक्यू" तथा "गुजूरू" पद्धतियां प्रचलन में हैं। "क्यो कुशिन" की शुरुआत तो की थी जापान के मासुवात्सु ओयामा ने, पर इसे परिपक्व बनाया संगठन संस्थापक एवं अंतर्राष्ट्रीय डायरेक्टर जनरल कांचो मॉस ओयामा ने। आज  96 देशों में लोग इस पद्धति से प्रशिक्षण ले रहे हैं। भारत में इसकी 81 शाखाएं हैं। जहां 33 हजार युवक- युवतियों कराते सीख रहे हैं। राजस्थान और जम्मू कश्मीर के अलावा देश के अन्य सभी राज्यों में इसके प्रशिक्षण केंद्र हैं।
0 आपकी आर्थिक आवश्यकताओं की पूर्ति कैसे होती है? भारत सरकार की तरफ से कितना सहयोग मिलता है आपको?
- विश्व कमेटी हमारी काफी मदद करती है। हम यहां उन्हीं की ओर से कार्य कर रहे हैं। हमारी विदेश यात्रा का व्यय भी कमेटी देती है। भारत सरकार अन्य खेलों के लिए तो अपने खिलाडिय़ों का खर्च वहन करती है, पर हमें ऐसी मदद नहीं दी जाती। हालांकि हमने कभी सरकार से मदद मांगी नहीं। फिर भी हम जहां सार्वजनिक प्रदर्शन करते हैं, वहां स्थानीय प्रशासन की तरफ से काफी मदद मिल जाती है।
0 सार्वजनिक प्रदर्शन से लाभ क्या हैं?
- लोगों को कराते की सारी विधाएं दूर से एक-सी नजर आती हैं। सार्वजनिक प्रदर्शन से इन सभी का उचित मूल्यांकन हो सकता है। लोगों को पता चलता है कि कौन सही है और कौन गलत।
0 विश्व कराते में भारत का क्या भविष्य हैं?
- यह तो सभी जानते है कि भारत ही कराते का प्रवर्तक है। अब यहां सेना एवं पुलिस में कराते का प्रशिक्षण शुरू हो गया है। कराते में भारत का भविष्य अन्य राष्ट्रों की अपेक्षा ज्यादा उज्जवल है।
- दिनेश ठक्कर 
(5 जुलाई 1981 को पत्रिका "धर्मयुग", मुंबई में प्रकाशित)

शुक्रवार, 14 जून 2013

यादें : धर्मयुग में कराते चैम्पियन दादी बलसारा से भेंटवार्ता प्रकाशित

द टाइम्स ऑफ इंडिया ग्रुप की लोकप्रिय रही हिन्दी पत्रिका "धर्मयुग" जब श्री धर्मवीर भारती के संपादन में प्रकाशित होती थी, तब उसका हर अंक अपना अलग मायने रखता था। उस वक्त "धर्मयुग" में छपना किसी भी कलमकार के लिए प्रसन्नता और गर्व का विषय होता था। यह मेरा भी सौभाग्य था कि श्री धर्मवीर भारती ने "धर्मयुग" के 5 जुलाई 1981 के अंक में जापानी क्यो कुशिन काई-कान कराते के चैम्पियन-ट्रेनर शिहान दादी बलसारा से लिया गया मेरा विशेष साक्षात्कार प्रकाशित किया था। उस समय कोलकाता निवासी फोर्थ डेन ब्लैक बेल्टधारी दादी बलसारा क्यों-कुशिन काई कान कराते (कराटे) की भारतीय शाखा के अध्यक्ष और दक्षिण पूर्व एशिया कराते फेडरेशन के उपाध्यक्ष भी थे। मेरे गृह नगर बिलासपुर के राजा रघुराज सिंह स्टेडियम में उन्होंने अपने पेट के ऊपर से कार पार करवाने का हैरतअंगेज प्रदर्शन किया था। इसके बाद मैंने उनसे वैश्विक कराते और उनकी उपलब्धियों पर आधारित भेंटवार्ता की थी, जिसे "धर्मयुग" में प्रकाशित किया गया था। श्रद्धेय श्री धर्मवीर भारती के प्रोत्साहन के कारण ही मुझे पहली बार राष्ट्रीय स्तर पर लेखक-पत्रकार बतौर पहचान मिली। बाद में जब श्री गणेश मंत्री कार्यवाहक संपादक और श्री विश्वनाथ सचदेव संपादक बने, तब भी उनके संपादकीय विभाग द्वारा टेलीग्राम के जरिये विषय प्रेषित कर मुझसे छत्तीसगढ़ अंचल से जुड़ी विभिन्न रिपोर्ताज मंगाई जाने लगी। "धर्मयुग" में मेरी रिपोर्ताज के प्रकाशन का सिलसिला वर्ष 1993 तक अनवरत जारी रहा। फिर जनसत्ता मुम्बई से जुड़ने के कारण "धर्मयुग" के लिए मेरा लिखना बाधित हो गया। कालांतर में "धर्मयुग" का प्रकाशन बंद हो जाना दुखदायी रहा। इस पत्रिका की अब यादें ही शेष रह गई हैं। मेरी प्रकाशित रिपोर्ताज वाले इसके अंक मेरे संग्रहण में अब भी सुरक्षित हैं, जो मेरे लिए धरोहर सदृश्य हैं।                           

शनिवार, 11 मई 2013

रामनामियों की रामनवमी

रामनवमी को ग्राम ओड़काकन की हर धड़कन हरिजन रामनामियों के नाम हो जाती है। रामनामी गुरू-गोसाइयों और भक्तों के अंग-प्रत्यंग पर सुई से किया हुआ राम नाम का अंकन, सिर पर सज्जित मोर पंखी बांस मुकुट, बदन पर लिपटा राम-राम लिखित सूती शाल, पैरों में बंधे घुंघरूओं की खनक, घुंघरू मंडित काष्ठ चौकों की ध्वनि और राम-राम के कर्णप्रिय लयात्मक उच्चारण से समूचा वातावरण राममय हो जाता है। एक तरफ मेला, तो दूसरी तरफ रामनामियों का संत- समागम। दोनों ही छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति और आस्था का प्रतिनिधित्व करते हैं। रायपुर जिले का सीमावर्ती और महानदी का तटवर्ती गांव है- ओड़काकन। भटगांव विधानसभा क्षेत्र के तहत यह गांव आता है। इनमें रामनामी पंथ के रामनामियों की संख्या यद्यपि तीन सौ से ज्यादा नहीं है, लेकिन चैत्र मास की रामनवमी को यहां न केवल रायपुर बल्कि बिलासपुर और रायगढ़ जिले के भी सैकड़ों रामनामी इकट्ठे होते हैं।
महानदी के किनारे स्थित रामनामी मंदिर के सामने सन् 1948 से मेला भर रहा है। इसे सीपत के कृषक-गौटिया स्व. पहारू राम ने शुरू करवाया था। इसके पीछे रामनामियों की अंतर्धारणा भी अलग है। ओड़काकन को अयोध्या और महानदी को सरयू नदी का दर्जा देकर रामनामी मेला शुरू किया गया था। बाद में यह गांव, गढ़कापन कहलाता था। इस गांव को रामनामियों का आदि-शिष्य मान लिए जाने से हर साल चैत्र माह की रामनवमी को संत- समागम तथा छोटे भजन (मेला) का आयोजन होता है। मेले में सिनेमा, सर्कस आदि  मनोरंजन साधनों के लिए अनुमति जरूर रहती है। असामाजिक और अनैतिक कामों पर सजा भी दी जाती है।
रामनवमी के दिन रामनामियों और राम-राम बड़े भजन (वार्षिक सम्मेलन) की मांग के लिए आवेदन पत्र भी दिए जाते हैं। पौष शुक्ल एकादशी से त्रयोदशी तक तीन दिनों का यह वार्षिक सम्मेलन अंत में ओड़काकन में ही विसर्जित होता है। राम-राम बड़े भजन के सदृश्य रामनवमी को संत समागम छत्तीसगढ़ में बहुचर्चित हो गया है।
रामनामी मंदिर के पीछे वाद्यरहित भजन-बैठक होती है। इसमें अनेक रामनामी सपरिवार शामिल होते हैं। रामनामी विधवाएं भी राम-नाम में लीन होने आती हैं। रामनामी महासभा के अध्यक्ष गुरू गोसाई इस भजन बैठक को संचालित करते हैं। तीन - चार रामनामी क्रमवार आकर थिरकते हैं, शेष बैठे रामनामी पुरुष और महिलाएं रामधुन में अपना सुर मिलाते हैं। हर भजन बैठक के बाद प्रसाद बांटा जाता है। शाम ढलने के बाद की बैठक चरमोत्कर्ष पर होती है। राम-राम का विभिन्न लय में आरोह-अवरोह बेमिसाल रहता है। रामनामी पंथ के टीकाकार द्वारा पारी-पारी रामचरितमानस का पाठ भी अनूठा रहता है।
यहां के रामनामी मंदिर की खासियत है कि उसमें राम की प्रतिमा नहीं है, दीवारों में केवल राम नाम की लिखावट है। रौशनी भी नहीं रहती है। रात को मात्र दीपक टिमटिमाता है। मंदिर के शिखर पर रामांकित श्वेत ध्वज हमेशा फहराता है। संत समागम के दिन पुजारी और दो रामनामी भक्त मंदिर में बैठकर रामचरितमानस का पाठ करते हैं। रामनामी और अन्य वर्ग के ग्रामीणजन इस पोथी की पूजा-अर्चना कर यथाशक्ति चढ़ावा अर्पित करते हैं। सन् 1948 में यह मंदिर रमतिन बाई के सहयोग से बना था, जबकि बोधराम गोविंदराम बंजारे ने जमीन दान में दी थी।
जब से यह रामनामी मंदिर बना है, तब से इसमें बिना दहेज के सामूहिक विवाह की अनोखी परंपरा भी शुरू हुई है। विवाह के पहले वर वधु को रामनामी महासभा के निर्धारत शर्तों वाले प्रपत्र को भर कर (हस्ताक्षर सहित) पंजीयन करवाना पड़ता है। बाद में उस प्रपत्र को महासभा के अध्यक्ष मुहर लगाकर हस्ताक्षर कर स्वीकृत करते हैं। मसौदे के तहत पति-पत्नी परित्याग निषेध रहता है। शुरुआती कार्यवाही के बाद दोनों पक्ष से पुजारी द्वारा मात्र एक-एक नारियल लिया जाता है। दांपत्य जीवन में दाखिल होने के प्रमाण स्वरूप वर और वधु के माथे पर राम नाम का गोदनांकन किया जाता है। फिर रामचरितमानस को साक्षी मानकर उसे बीच में रखकर सात फेरे लिए जाते हैं। इस दौरान अभिभावक और अन्य लोग राम-नाम उच्चारित करते हैं। रस्म पूरी होने के बाद वर-वधु के लोग रामचरितमानस पर पच्चीस-पच्चीस रुपए वैवाहिक दक्षिणा बतौर चढ़ाते हैं। रामनामी पंथ में चैत्र मास की रामनवमी को विवाह होना अति शुभ माना जाता है। वैसे वार्षिक सम्मेलन में भी इसी तरह के आदर्श विवाह की प्रथा है। तब रामनाम लिखित जयस्तंभ (चबूतरा) क्षेत्र में विवाह रस्म पूरी होती है। यदि विवाह के बाद कन्या विधवा हो जाती है तो इसका पुनर्विवाह चूड़ी प्रथा द्वारा होता है, तब विवाह करने वाले व्यक्ति को रामनामी समाज को भांति (भोजन) देना पड़ता है। 
अभिभावक, पति, पत्नी और संतान की मृत्यु होने पर उसकी अस्थियां गंगा नदी के बजाय महानदी में ही विर्सजित की जाती है। शिवरीनारायण में माघ पूर्णिमा को सामूहिक रूप से स्नान करने की परंपरा भी है। 
- लेख और चित्र : दिनेश ठक्कर
(17 अप्रैल 1994, रविवार को जनसत्ता, दिल्ली में प्रकाशित)

शुक्रवार, 10 मई 2013

यादें : जनसत्ता दिल्ली में रामनामियों पर आलेख

महानदी के तटवर्ती ग्राम ओड़काकन में आयोजित होने वाला रामनामियों का मेला और संत समागम छत्तीसगढ़ की विशिष्ट लोक संस्कृति और आस्था का प्रतिनिधित्व करता है। इसी विषय पर आधारित मेरा आलेख १७ अप्रैल १९९४ को जनसत्ता, दिल्ली के रविवारीय परिशिष्ट में प्रमुखता से शामिल किया गया था। इसकी कतरन मेरे संग्रह में सुरक्षित है। इसकी छाया प्रति सुधि पाठक मित्रों के लिये सादर प्रस्तुत है। जनसत्ता के कोलकाता संस्करण के प्रारंभ काल में उप संपादक और फिर उसके बाद मुम्बई संस्करण में अनुबंधित संवाददाता-लेखक बतौर कार्य करने का अवसर प्रधान संपादक श्रद्धेय प्रभाष जोशी के स्नेहमयी आशीर्वाद के फलस्वरूप ही मिला था। उन्हें श्रद्धा सुमन अर्पित है। .