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मंगलवार, 21 फ़रवरी 2012

रहस्य के आवरण में रूद्र-शिव की प्रतिमा - (३)

साधारणतः शिव मंदिर पूर्वाभिमुख रहता है, लेकिन जेठानी मंदिर  दक्षिणामुखी है, जो कि अशुभ देवताओं के साथ संलग्न होता है. वैसे जेठानी मंदिर के वास्तु शिल्प को नए सिरे से आंकलित करने के बाद ही यह निश्चित हो पायेगा कि प्रतिमा किस मंदिर की है. बहरहाल, खुदाई के द्वितीय चरण में इस प्रतिमा के खंडित हिस्से जैसे हाथ के नाखून, ऊपर का सर्प, एवं पैर के पास का सर्प मिला है, जिसे एरलडाईट आदि से जोड़ दिया गया है. रसायन विशेषज्ञों के एक दल ने इस मूर्ति का परीक्षण कर उसमें आवश्यक संरक्षात्मक रसायन लगाए हैं. तालागांव की महत्ता को देखते हुए अब इस प्रतिमा को इस स्थान पर सुरक्षित रखने का प्रबंध जरूरी हो गया है. (समाप्त)

-दिनेश ठक्कर
(पत्रिका धर्मयुग, मुंबई के २५ सितम्बर १९८८ के अंक में प्रकाशित)                       

रहस्य के आवरण में रूद्र-शिव की प्रतिमा - (२)

नामकरण की असमर्थता : जहाँ तक प्रतिमा के प्रमाणिक नामकरण का सवाल है, तो इस मसले पर स्वयं पुरातत्व अधिकारियों ने असमर्थता जाहिर की है. केवल अनुमान के आधार पर इस प्रतिमा का नामकरण कर दिया गया है. उत्खनन निर्देशक के.के. चक्रवर्ती ने प्रतिमा का तादात्म्य शिव के रूद्र स्वरुप से स्थापित करते हुए लकुलीश मत के साथ संबद्ध होने की संभावना व्यक्त की है. हावर्ड विश्वविद्यालय के प्राध्यापक डा. प्रमोद चन्द्र ने भी इसे रूद्र शिव की प्रतिमा होने का आंकलन किया है. कुछ पुरातत्वविदों ने इसे पशुपति की मूर्ति बताया है. परन्तु इसमें भी विरोधाभास है. धर्मशास्त्रों के अनुसार, पशुओं को भी जीवात्मा के रूप में मानते हैं, जबकि पति को परमात्मा कहा गया है. पशुपति की मूर्ति में इसका मिलन है. पशुपति की मूर्ति में पशु साथ में दिखते हैं, न कि शरीर पर उत्कीर्ण रहते हैं. लेकिन तालागांव की इस चर्चित प्रतिमा में पशु शरीर पर दिखाए गए हैं. सम सामयिक प्रामाणिक जानकारी अनुपलब्ध होने से इस मूर्ति का रहस्य अनावृत्त नहीं हो पा रहा है. साधारणतः शिव के सौम्य भाव वाली मूर्तियाँ पाई जाती हैं, परन्तु रौद्र भाव की प्रतिमाएं बहुत ही कम मिली हैं. राज्य के विभिन्न स्थलों में अब तक गजारी, त्रिपुरांतर, काल भैरव, बटुक भैरव, उन्मत्त भैरव, वीरभद्र, कंकाल एवं अघोर जैसी रौद्र स्वरुप वाली मूर्तियाँ मिल चुकी हैं. लेकिन तालागांव में में प्राप्त मूर्ति का रौद्र स्वरुप अति विकट है. इसके समकक्ष की अन्य कोई प्रतिमा भी अब तक कहीं नहीं मिली है. प्रतिमा के अंग-प्रत्यंग भयावह होने के साथ साथ रौद्रता को भी उजागर करते हैं. यों शिव को भूतेश भी कहा गया है. अतः प्रतिमा पर फन फैलाए नाग सर्प तथा शरीर पर अंकित गण का होना स्वाभाविक है. इस प्रतिमा को देख कर स्पष्ट होता है कि शिव के चरित्र में संहारमूलक और सृजनमूलक व्यवहार का एक साथ संजोग है. आकार प्रकार की दृष्टि से भी यह प्रतिमा निराली है. यद्दपि करीब १४ फुट ऊँची एक विशाल मूर्ति विदिशा के पास नदी के अन्दर से मिल चुकी है, लेकिन वह यक्ष प्रतिमा है.
शास्त्र के आधार पर निर्मित : तालागांव में मिली प्रतिमा के पुरातात्विक विश्लेषण से ज्ञात होता है कि इसके निर्माण में केवल उर्वरा कल्पना शक्ति का ही सहारा नहीं लिया गया है, बल्कि मूर्तिकार द्वारा किसी शास्त्र को ध्यान में रखते हुए मूर्ति बनाई गई है. साथ ही इसके द्वारा स्वयं के शिल्प कौशल का बखूबी इस्तेमाल किया गया है. अनुमान है कि उस समय आसपास तांत्रिक साधना का जोर रहा होगा, जिससे प्रेरित होकर मूर्तिकार ने उपासना के लिए सौम्य रूप के बजाय रौद्र रूप वाली प्रतिमा तराशी होगी. यह प्रतिमा तालागांव के देवरानी मंदिर की है अथवा जेठानी मंदिर की, यह प्रश्न भी अनुत्तरित है. प्रतिमा की स्थिति और उसके सुरक्षित रखे जाने की पूर्व  हालत को मद्देनजर रखते हुए पुरातत्व अधिकारी यह बता पाने में सक्षम नहीं हैं कि प्रतिमा किस मंदिर में प्रतिष्ठित और पूजित रही होगी. उत्खनन निर्देशक के अनुसार, आम तौर पर मूर्ति मंदिर के पास ही रखी जाती है. यद्दपि इस आकार की कोई दूसरी मूर्ति देवरानी मंदिर में नहीं मिली है, पर जेठानी मंदिर में ज्यादा मिली है. हालांकि रूद्र रूप शिव के गण देवरानी मंदिर की खुदाई में मिले हैं, परन्तु प्राप्त प्रतिमा इस मंदिर की मुख्य मूर्ति नहीं हो सकती है. (जारी)                     

सोमवार, 20 फ़रवरी 2012

रहस्य के आवरण में रूद्र-शिव की प्रतिमा

(दिनेश ठक्कर)
ताला गाँव वर्तमान में अपने विशिष्ट मूर्ति शिल्प के कारण न केवल देश में बल्कि पूरे विश्व में विख्यात हो चुका है. बिलासपुर से तीस किलोमीटर दूर स्थित पुरातात्विक स्थल पर जनवरी, १९८८ के दूसरे पखवाड़े में एक अद्वितीय उर्धरेतन प्रस्तर प्रतिमा खुदाई के दौरान प्राप्त हुई है. यह देवरानी मंदिर के मुख्य द्वार के समीप सोपान की दीवार से तीन फुट दूर, ६ फुट की गहराई में मिली. लगभग १५०० वर्ष पुरानी यह प्रतिमा ९ फुट एवं ५ टन वजनी है. शिव के रौद्र रूप को दर्शाने वाली यह प्रतिमा विलक्षण और द्वैत व्यंजना से परिपूर्ण है, जो विश्व मूर्ति कला के इतिहास में भी अनूठी है.
पुरातत्व विभाग के पूर्व संचालक के.के. चक्रवर्ती के उत्खनन निर्देशन में स्थानीय पुरातत्व अधिकारी जी. एल. रायकवार एवं राहुल कुमार सिंह द्वारा देवरानी मंदिर के बाह्य भाग में ईट की बंधान देकर क्षेतिजीय खनन करवाया गया था. ११ जनवरी १९८८ से इस मंदिर के तीन तरफ ट्रेंच लेकर खुदाई शुरू की गई थी. खुदाई के दौरान प्राप्त प्रतिमा दक्षिण पूर्व की दिशा में मुंह के बल लेटी हुई थी. लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग से चैन पुली की मदद लेकर इसे बाहर निकाल कर मंदिर के समीप खडा कर दिया गया है.
उल्लेखनीय है लेमेटा स्टोन (फर्शी पत्थर) से निर्मित इस प्रतिमा के अंग प्रत्यंग जलचर, नभचर और थलचर प्राणियों जैसे बने हैं. प्रतिमा के शिरो भाग पर पगड़ीनुमा सर्प सज्जित प्रभामंडल है, जबकि कान मयूराकृति के हैं. आँखें दानव आकार की हैं. भौंह तथा नाक छिपकिली सी बनी है. मूंछ मछली से बनाई गई है, तो ठुड्डी केकड़े से. प्रतिमा की भुजाओं हेतु मगर का चयन किया गया है. हाथ के नख सर्पाकार हैं. वक्ष स्थल पर दानव मुख उत्कीर्ण है. उदर के लिए मूर्तिकार ने गण-मुख का प्रयोग किया है. उर्ध्वाकार लिंग कच्छप मुख के सदृश्य है. जंघाओं पर चार सौम्य भाव वाली मुखाकृति भी बनाई गई है.
पुरातत्व विभाग द्वारा इस प्रतिमा का काल निर्धारण मुख्यतः मूर्ति शिल्प और केश सज्जा को दृष्टिगत रखते हुए किया गया है. यह प्रतिमा गुप्त काल के तुरंत बाद की है, अर्थात छठवीं सदी के शुरूआत की. इस प्रतिमा में गुप्तकालीन शिल्प कला का प्रभाव ज्यादा प्रतीत होता है. प्रतिमा पर उत्कीर्ण केश, केश सज्जा, वेशभूषा तथा आकार-प्रकार पूरी तरह गुप्तकालीन है. (जारी)
                                              

धर्मयुग में रूद्र शिव की प्रतिमा पर आलेख

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) से तीस किलोमीटर दूर स्थित ताला गाँव में देवरानी मंदिर के मुख्य द्वार के समीप वर्ष १९८८ के जनवरी माह के दूसरे पखवाड़े में खुदाई के दौरान प्राप्त रूद्र शिव की प्रतिमा पर राष्ट्रीय स्तर पर सर्वप्रथम मेरी विशेष रपट पत्रिका धर्मयुग के २५ सितंबर, १९८८ के अंक में प्रकाशित हुई थी. उसकी फोटो कॉपी यहाँ प्रस्तुत है.      

ताला में रूद्र शिव की प्रतिमा के संग

रूद्र शिव की यह अद्वितीय उर्धरेतन प्रस्तर प्रतिमा बिलासपुर (छत्तीसगढ़) से तीस किलोमीटर दूर स्थित ताला गाँव के देवरानी मंदिर के मुख्य द्वार के समीप  वर्ष १९८८ में जनवरी के दूसरे पखवाड़े में खुदाई के दौरान प्राप्त हुई थी. करीब १५०० वर्ष पुरानी यह प्रतिमा ९ फुट ऊंची है.  शिव के रौद्र रूप को दर्शाने वाली यह प्रतिमा विलक्षण और द्वैत व्यंजना से परिपूर्ण है, जो विश्व मूर्तिकला के इतिहास में भी अनूठी है. फर्शी पत्थर से निर्मित इस प्रतिमा के अंग-प्रत्यंग जलचर, नभचर और थलचर प्राणियों जैसे बने हैं. इस प्रतिमा में गुप्तकालीन शिल्प कला का प्रभाव ज्यादा प्रतीत होता है. फरवरी, १९८८ में प्रतिमा का अवलोकन करते हुए मेरे साथ वरिष्ठ पत्रकार मित्र प्राण चड्डा, नथमल शर्मा और सीतेश द्विवेदी.                                  

बुधवार, 28 दिसंबर 2011

सत्यदेव दुबे के रंग और कर्म का सच - (२)


कच्चे रास्ते के ठीक बीचों बीच/ अब भी राख का धब्बा पडा होगा/ बहुत पहले कभी मैंने/ नीम की पीली झरी पत्तियों की/ ढेरी जलाई थी/ धुआं कडवाहट मुझे स्वीकार है.... सत्यदेव दुबे अपने पड़ोसी मित्र डा. धर्मवीर भारती द्वारा लिखित कविता "फागुन में शेष" की उक्त बेबाक पंक्तियाँ अक्सर गुनगुनाते थे. खासकर, जब कोई अन्तरंग व्यक्ति उनके व्यक्तित्व के उलझे व्याकरण पर कटाक्ष करता था, तब वे इन्हीं पक्तियों के माध्यम से अपनी अंतर्मुखी अभिव्यक्ति प्रकट करते थे. इसका मुख्य कारण यह था जीवन भर उन्होंने छद्म आवरण कभी स्वीकार नहीं किया. जो भीतर था, वह ज्यों का त्यों बाहर था. वे अपने आप को वे बेलगाम घोड़े के सदृश्य नहीं बल्कि एक बेलाग इंसान जरूर समझते थे. यद्दपि उन्हें जीवन पर्यंत थियेटर और सिने इंडस्ट्री के कुछ बौद्धिक ईर्ष्यालु जनों द्वारा असामाजिक करार दिए जाने की कोशिश की जाती रही. असल में वे अंतर्मुखी थे. मुंह फट थे. किन्तु दिल के साफ़ थे. उनके आचार, विचार और व्यवहार में एकरूपता थी. अपनी बेबाक अभिव्यक्ति में वे किसी नासमझ और गैर जिम्मेदार व्यक्ति की दखलंदाजी बिलकुल बर्दाश्त नहीं करते थे. उन्हें अपनी बाहरी दिखावटी छवि अपनाने की कोई गरज नहीं थी. उन्हें किसी की परवाह नहीं थी. परवाह थी तो केवल अपने बेहतर काम की. उनके विचारों में कोई अंतर्विरोध नहीं था. कहीं भी "शो पीस" बनना उन्हें कभी मंजूर न था. जुबान, दिल और दिमाग एक था. इसमें कोई बेजा घालमेल नहीं था. उत्कृष्ट सृजन के नाम पर विचारों और संवेदनाओं की तानाशाही बाह्य रूप से कभी कभी अवश्य दृष्टिगोचर होती थी, परन्तु उनका अंतर्मन कुछ अलहदा था. उन्हें मुंबई के थियेटर क्षेत्र में आदरपूर्वक "पंडित जी" के नाम से संबोधित किया जाता था. लेकिन कोई वर्कशाप हो या प्ले की रिहर्सल हो अथवा सेमीनार, यहाँ उनके प्रशिक्षण-निर्देशन की शैली, संवाद, व्याख्यान और संबोधन में जातिगत पांडित्य कहीं नहीं झलकता था. वे रौबदार ठाकुर के अंदाज में पेश आते थे. उनका यह स्वरुप सृजन की नयी पीढी के हस्ताक्षरों की समझ से भी परे होता था.
सत्यदेव दुबे के लिए उनका भोगा यथार्थ और अनुभवजनित आक्रोश उन्हीं के व्यक्तित्व के व्याकरण की अवधारणा बन गया था. मुंबई के पृथ्वी थियेटर में शुरूआती सक्रियता के दौरान ही मुखौटाधारी रंगकर्मी उन्हें रंगकर्म जगत का परशुराम और दुर्वासा ऋषि कहने लग गए थे. उनके बेबाकी और कड़े कार्य-अनुशासन की खुले आम आलोचना होने लगी. उनका  "बुलिश एटीटयूट" खुद की थियेटर यूनिट के शिष्य कलाकार, कर्मियों को शुरू में समझ नहीं आता था, किन्तु उनके जायज क्रोध की आग में तपने के बाद वे कुंदन बन जाते थे. वास्तव में वे रंगकर्म के आश्रम के एक ऐसे गुरू ऋषि द्रोणाचार्य थे, जिन्होंने कई नौसीखिए को अभिनय के प्रभावी तीर तरकश से लैस किया था. छिपकर उनकी कला को आत्सात करने वाले कई एकलव्य अच्छे कलाकार भी बने, किन्तु सत्यदेव दुबे ने उनसे कोई गुरू दक्षिणा नहीं ली वरन कुछ एकलव्य कलाकारों ने उन्हें अंगूठा दिखाकर अवश्य चिढाया. जबकि इन्होने पौराणिक काल के गुरू द्रोणाचार्य की मानिंद व्यवस्था के साथ कोई समझौता नहीं किया, जिससे इनका आचार्य कला-कर्म बदनाम होने से बच गया. गुरू द्रोणाचार्य के किरदार का सच उन्होंने स्वयं के संघर्ष से भलीभांति समझ लिया था. इसीलिये सत्यदेव दुबे अपने बिलासपुर ( वर्ष १९७४ से मुंबई वासी हुए थे ) के नाटककार मित्र डा.शंकर शेष द्वारा लिखित नाटक "एक और द्रोणाचार्य" का भी सटीक मंचन मुंबई में कर सके थे.  इस नाटक के जरिये उन्होंने यह साबित करने की सफल कोशिश की थी सही मायने में आज कौन गुरू द्रोणाचार्य है और कौन नहीं. कथ्य और शिल्प की दृष्टि से शक्तिशाली इस नाटक को उन्होंने एक नया कलेवर दिया था. नए जमाने के अध्यापक अरविन्द और पौराणिक काल के गुरू द्रोणाचार्य का परस्पर पूरक व्यक्तित्व तथा उनका बिम्ब-प्रतिबिम्ब को मंच पर जीवंत करना नाट्य गुरू सत्यदेव दुबे के चुनौतीपूर्ण था, जिसमें वे शिद्दत के साथ कामयाब रहे.
सत्यदेव दुबे को दो-चार मुलाक़ात में समझना आसान नहीं था. मेरे साथ भी यही हुआ था. बिलासपुर में वर्ष १९८० से सक्रिय पत्रकारिता से जुड़ने से पहले भी मैं विद्यार्थी जीवन में हर साल गर्मी की छुट्टियों में मुंबई अपनी बुआ के यहाँ जाता था. वहां गुजराती नाटकों का क्रेज होने के कारण चर्चित नाटक अवश्य देखता था. लेकिन टिकट खरीद कर हिन्दी नाटक व्यावसायिक मंच पर देखने का सिलसिला बिलासपुरिया सत्यदेव दुबे के आकर्षण के कारण ही प्रारंभ हो सका. शालेय जीवन के दौरान बिलासपुर के अपने मुहल्ले जगमल ब्लाक में पड़ोसी रंगकर्मी सुनील मुखर्जी के कारण ही हिन्दी नाटकों से मेरा लगाव हुआ था. उन्होंने ही मुझे सबसे पहले सत्यदेव दुबे और डा. शंकर शेष की नाट्य  उपलब्धियों के बारे में बताया था. फिर मेरी महाविद्यालयीन शिक्षा के वक़्त सुनील मुखर्जी पड़ोस के मुहल्ले दयालबंद रहने चले गए थे. तब भी उनके साथ होने वाली बैठकों में सत्यदेव दुबे का ही फालोअप जिक्र होता था. इसलिए मैं सत्यदेव दुबे के मूल स्वभाव से परिचित था, लेकिन उनकी रंग-कला से मैं रूबरू हुआ मेट्रिक करने के बाद. डा. शंकर शेष द्वारा लिखित नाटक "अरे मायावी सरोवर" को सत्यदेव दुबे ने वर्ष १९७४ से मुंबई में मंचित करना आरम्भ कर दिया था. टिकट खरीदकर देखा गया मेरा पहला दर्शनीय हिन्दी नाटक यही था. इसी नाटक के माध्यम से सत्यदेव दुबे की रंग-शैली से पहली बार मेरा साक्षात्कार हुआ. फिर तो जब भी मैं मुंबई जाता तब स्थानीय हिन्दी अखबारों को पढ़ कर पता लगाने की कोशिश करता सत्यदेव दुबे का नाटक कहाँ खेला जा रहा है.
वर्ष १९९३ में जब मैं बिलासपुर छोड़ कर मुंबई में पत्रकारिता करने गया, तब कला, संस्कृति, फिल्म मेरा विषय क्षेत्र होने के कारण पांच साल के दरम्यान सत्यदेव दुबे से ख़ास अवसर पर ही मेरी मुलाकात होती थी. वर्ष १९९४ के सितम्बर माह के आख़री हफ्ते में पहली बार उनके साथ मेरी व्यक्तिगत बैठक जुहू के जानकी कुटीर के पास स्थित फिल्म अभिनेता शशी कपूर के पृथ्वी थियेटर के कैफे में हुई थी. माध्यम थी शशी कपूर की पुत्री अभिनेत्री संजना कपूर, जो उस समय पृथ्वी थियेटर के प्रबंधन का कार्य भार सम्हाले हुई थी. उस बैठक के दौरान जब मैंने सत्यदेव दुबे को अपने प्रारंभिक परिचय में बिलासपुर का मूल निवासी होने का जिक्र किया तो वे थोड़े नाराज हुए लेकिन मेरा पूरा परिचय जानने और विविध लेखन कार्य से अवगत होने के बाद ही उन्होंने "लिफ्ट" दी. काफी पीने के दरम्यान जब मैंने उन्हें बताया सम्पादक धर्मवीर भारती ने राष्ट्रीय पत्रिका "धर्मयुग" के ५ जुलाई, १९८१ के अंक में मेरे द्वारा लिया गया कलकत्ता के कराटे मास्टर दादी बलसारा का साक्षात्कार प्रकाशित किया था, धर्मवीर भारती के कारण ही धर्मयुग में लगातार मेरी रपट छपने का सिलसिला शुरू हुआ था, यह जान कर सत्यदेव दुबे प्रसन्न हो गए. मेरे प्रति उनका नजरिया एकाएक सकारात्मक हो गया. वजह थे धर्मवीर भारती. सत्यदेव दुबे को जब मैंने यह भी बताया जनसता, मुंबई की रविवारी पत्रिका "सबरंग" में अपने स्तम्भ "मंच" में मुंबई के रंगमंच की शोधपरक सीरिज लिख रहा हूँ. १८ सितम्बर,१९९४ के अंक में पृथ्वी थियेटर पर भी लिखा हूँ, इसकी फोटो कापी देने पर वे ज्यादा खुश हुए. लेकिन जब मैंने उनसे भेंट वार्ता देने का आग्रह किया तो साफ़ इनकार कर दिया. उनका तर्क था "मैं छपने में नहीं, काम करने में भरोसा रखता हूँ, लिखना है तो सिर्फ मेरे नाटकों पर लिखो, मुझ पर नहीं".
दरअसल, सत्यदेव दुबे की सोच स्पष्ट थी. वे स्वयं को मीडिया में महिमा मंडित नहीं करवाना चाहते थे. अपनी मार्केटिंग कला के जरिये ही करने के वे पक्षधर थे. इसीलिये संजना कपूर कहती भी थी "सत्यदेव दुबे अपने आप में ड्रामा स्कूल हैं". यह गौरव उक्ति सौ फीसदी सत्य थी. इसीलिये वे नाटकों के निर्देशन की शतकीय पारी खेल सके.
वे नयी पौध को हमेशा अपने अनुभव से बेहतर रंगकर्म के लिए उत्प्रेरित किया करते थे. जीवन के ज्यादातर लम्हों में वे दूसरों से नहीं बल्कि स्वयं से संबोधित होते रहते थे. उनके भीतर का निष्पक्ष रंगकर्मी खुद से सवाल किया करता था.जवाब ढूँढने के लिए वे अपने आसपास और कभी यादों तथा अनुभवों के पृष्ठ पलटते थे. इसके अलावा वे अपने अन्तरंग मित्रों जिसमें डा. धर्मवीर भारती भी शामिल थे, का लिखा, पढ़ा और सुना प्रेरणा तथा सृजन का स्त्रोत हुआ करता था.खुद का अनुभव, अध्ययन और चिंतन सृजन में सहायक था ही. कलात्मक कृति और सृजन शिल्प का भेद समझने के लिए उनकी स्वयं की अभ्यस्त संवेदनशीलता और अक्खडपन भी मददगार था. इसीलिये उनके नाटकों में भी चाक्षुष बिम्ब रूपों का प्रयोग होता था. प्रतीकात्मक मुद्राओं के बजाय वे सीधे साफगोई सूचनात्मक तरीके को तरजीह देते थे. अति नाटकीयता से वे परहेज किया करते थे. नाट्य भाषा के निरंतर विघटन को लेकर वे अंतिम समय तक चिंतित थे.
सत्यदेव दुबे ने दो नाव पर सवारी करने के बावजूद अपना मूल कला कौशल नहीं छोड़ा. शोषित स्त्री समाज की विभिन्न त्रासदियों को कलारूपों के जरिये फ़िल्मी परदे पर संवादों को परोसा था. यह अलग बात है वे स्वयं अपने दाम्पत्य जीवन में असफल साबित हुए थे. जीवन संगिनी स्त्री न बन सकी, बल्कि जीने का सहारा सृजन रहा. इनकी कोई संतान नहीं थी. हालांकि अपने भाई राजा बाबू दुबे के पोते फिल्म अभिनेता सत्यजीत (सुतीक्ष्ण दुबे के  पुत्र) को ही अपना पोता और वारिस मान कर स्नेह देते रहे. बिलासपुर में अपनी जमीन जायदाद की देखरेख का जिम्मा पारिवारिक मुनीम के पुत्र रमेश अग्रवाल को दे रखा था. सत्यदेव दुबे एकाकीपन से वे टूटे नहीं वरन अधिक मजबूत हुए थे.
सत्यदेव दुबे ने जब समानांतर हिन्दी सिनेमा का रूख किया तब भी उन्होंने अपनी शर्तों पर ही पट कथा और संवाद का लेखन किया. उन्होंने पट कथा, संवाद के माध्यम से सिने भाषा को नव आयाम दिया. सामाजिक अवमूल्यन को उन्होंने बेबाकी से आइना दिखलाया. सामाजिक असलियत को खडी बोली में दमदारी से पेश किया.
समानांतर या फिर कला सिनेमा की जटिल भाषा को आम बोलचाल की भाषा में बदलने की कोशिश कामयाब रही. निर्देशक श्याम बेनेगल और गोविन्द निहलानी ने अपनी फिल्मों में सत्यदेव दुबे की सार्थक सोच को कलात्मक जगह दी. श्याम बेनेगल की पहली हिन्दी फीचर फिल्म "अंकुर" (१९७४) की पट कथा और संवाद सत्यदेव दुबे ने लिखे थे. इस फिल्म को तीन राष्ट्रीय पुरस्कार समेत देश विदेश के ४३ पुरस्कार मिले थे. इसके बाद सत्यदेव दुबे ने श्याम बेनेगल की फिल्म "निशांत"(१९७५) लिखी, जिसे सर्वश्रेष्ठ हिन्दी फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था. शिकागो फिल्म समारोह में इसे "गोल्डन प्लेक"से सम्मानित किया गया था. श्याम बेनेगल की फिल्म "भूमिका" (१९७७) के लिए सत्यदेव दुबे को १९७८ में सर्वश्रेष्ठ पट कथा लेखन का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था. फिर श्याम बेनेगल की फिल्म "जुनून" (१९७८) के लिए सत्यदेव दुबे को फिल्म फेयर अवार्ड से सम्मानित किया गया था. इस फिल्म को सातवें अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह के उदघाटन अवसर पर भी दिखलाया गया था. फिल्म "कलियुग" (१९८०), "आक्रोश" (१९८०), "विजेता" (१९८२), और "मंडी" (१९८३) में भी सत्यदेव दुबे का लेखन सशक्त तरीके से सामने आया था.
सत्यदेव दुबे ने अपनी इन सभी समानांतर फिल्मों के माध्यम से दर्शकों और समीक्षकों के बीच जीवंत संवाद सूत्र स्थापित किया था. अपनी पट कथा और संवाद में उन्होंने किरदारों की छवियों को सहज और सारगर्भित बनाया था, जो दर्शकों को कतई सिनेमाई नहीं लगती थी. दर्शकों को ऐसा लगता था जैसे वे अपने आसपास के दृश्यों को जीवंत होते देख रहे हैं. उनकी पट कथा और संवाद में फिल्म की मूल कहानी के तत्त्व सटीक और स्पष्ट होते थे. संवादों में आम आदमी के बोलचाल के शब्द होने की वजह से वह फिल्म निर्देशकों, कलाकारों और दर्शकों को  भी सहज लगती थी. पट कथा में सूक्ष्म ब्यौरे और उनके किरदार अक्सर क्रुद्ध प्रतिक्रियाएं देते थे, क्योंकि वे इसी शोषित समाज का हिस्सा थे. अपने संवाद में सत्यदेव दुबे बड़े सच को भी छोटे छोटे विवरण और असल दृष्टांत से प्रतिस्थापित करते थे. उनके संवादों में उनकी उपस्थिति रहती थी, जो कलाकारों द्वारा अदायगी के वक़्त उसे जीवंत कर देती थी. वे अपने इर्दगिर्द के प्रसंगों को भी दिमागी सूझ बूझ के साथ संवादों में बखूबी पिरोते थे. फिल्म "मंडी" में सत्यदेव दुबे ने बिलासपुर के अपने मोहल्ले गोंड पारा स्थित चित्रगुप्त धर्मशाला के चबूतरे में फाकामस्त निवास करने वाले और पेशे से कुआं साफ़ करने वाले ६० वर्षीय शराबी गोंड आदिवासी टून्ग्रुस (इसकी मौत सिविल लाइन के एक कुएं को साफ़ करते वक़्त जहरीली गैस से हुई थी) का नाम अभिनेता नसीरूद्दीन शाह के किरदार के लिए इस्तेमाल किया था.जो इस फिल्म में नायिका रूकमनी बाई
(शबाना आजमी) का भरोसेमंद सहायक पुरूष होता है. सत्यदेव दुबे ने दो लघु फिल्म "अपरिचय के विंध्यांचल" और "टंग इन चीक" का भी निर्माण किया था. मराठी फिल्म "शांता ताई" का निर्देशन भी किया था. दूरदर्शन पर प्रसारित हुए श्याम बेनेगल के ऐतिहासिक सीरियल भारत एक खोज में चाणक्य की भूमिका बखूबी अदा कर सत्यदेव दुबे ने अपने सशक्त अभिनय का लोहा भी मनवाया था. सत्यदेव दुबे को आम फ़िल्मी नुस्खों से बेहद चिढ थी. सतही दर्शकों से से उनकी कोई गंभीर अपेक्षा भी नहीं थी. वे आख़री वक़्त तक समानांतर सिनेमा की सम्भावनाओं की खोज में जुटे हुए थे. समझौतावादी न होने के कारण आगे चल कर श्याम बेनेगल से भी अलगाव हो गया था. उन्होंने खुद को समानांतर सिनेमा की भाषा और उसमें अन्तर्निहित कलात्मक सम्भावनाओं तक सीमित रखा. खालिस धंधेबाज फार्मूला फिल्मों के ताने बाने में स्वयं को बेवजह उलझाना नहीं चाहते थे. वे इंग्लिश के अच्छे ज्ञाता होने के कारण हालीवुड के अलावा अन्य पश्चिमी देशों की प्रसिद्ध कलात्मक फिल्मों पर दृष्टिपात अवश्य करते थे, लेकिन उनके सृजन का मुख्य सरोकार देसी शोषित समाज से होता था. अपने जीवन के अंतिम समय वे बीमार होने से पहले राम नाम सत्य के नाम से एक फिल्म की पट कथा लिख रहे थे. किन्तु पट कथा का यह नाम इन्हीं पर लागू हो जाएगा कल्पना नहीं थी. ( समाप्त )        

@ दिनेश ठक्कर "बापा"
(चित्र : गूगल से साभार)                                                                           
                                                                                                             

मंगलवार, 27 दिसंबर 2011

सत्यदेव दुबे के रंग और कर्म का सच

झुरमुट में दुपहरिया कुम्हलाई/ खेतों में अन्हियारी घिर आई/ पश्चिम की सुनहरिया घुंघराई/ टीलों पर, तालों पर/ इक्के दुक्के अपने घर जाने वाले पर / धीरे धीरे उतरी शाम/ लगता है इन पिछले वर्षों में/ सच्चे झूठे, मीठे कडवे संघर्षों में/ इस घर की छाया छूट गई अनजाने .... डा. धर्मवीर भारती द्वारा लिखित चर्चित कविता "कस्बे की शाम" की उक्त पंक्तियाँ रंग ऋषि सत्यदेव दुबे पर चरितार्थ होती हैं. वे भी जीवन पर्यंत इस कविता के माध्यम से अपने खोये कस्बे और घर की छाया को अपने सृजन में तलाशते रहे. डा. धर्मवीर भारती के वे बेहद प्रिय पड़ोसी थे. परस्पर साहित्य सहवास भी अत्यंत अन्तरंग था. यह भी एक संयोग था निवास क्षेत्र का नाम "साहित्य सहवास" होना. मुंबई के उप नगर बांद्रा (पूर्व) में डा. धर्मवीर भारती के घर का पता "५, शाकुंतल, साहित्य सहवास" और सत्यदेव दुबे का ठौर ठिकाना "१०, फूलरानी , साहित्य सहवास". डा. भारती के अन्तरंग पड़ोसी होने के कारण सत्यदेव दुबे की साहित्यिक अभिरूचि में वृद्धि और सोच में व्यापकता स्वाभाविक थी. लेकिन रविवार, २५ दिसंबर २०११ को सुबह ११.३० बजे सत्यदेव दुबे के देहावसान से साहित्य सहवास की "फूलरानी" मुरझा गई. अपने भाई सदृश्य मित्र डा. भारती की तरह यायावर सत्यदेव दुबे भी अनंत यात्रा पर चले गए. उनका जाना सार्थक रंगमंच और समानांतर सिने कथा-संवाद जगत के लिए बड़ा झटका है. मुंबई के एक निजी अस्पताल में साँसों की डोर टूटने से उनके जीवन के रंगमंच का ही पर्दा नहीं गिरा है, अपितु प्रयोगधर्मी सृजन कर्म भी "लास्ट कट" के साथ "पैक-अप" हो गया है. कोमा में चले जाने के कारण उनके जीवन अध्याय के अंतिम "शाट" के "रिटेक" का मौका भी ऊपर वाले ने नहीं दिया. रंगमंच की दुनिया खासकर जुहू, मुंबई के पृथ्वी थियेटर से उनका दिलोदिमाग से गहरा जुडाव था. इसके प्रबंधन और मालिकाना हक़ को लेकर फिल्म अभिनेता शशी कपूर की पुत्री अभिनेत्री संजना कपूर और शशी कपूर के ही पुत्र कुनाल के बीच हुए पारिवारिक विवाद का सदमा सत्यदेव दुबे को भी लगा था. संजना कपूर को पृथ्वी थियेटर से अलग कर दिए जाने से इन्हें मानसिक आघात पहुंचा था. तब से सत्यदेव दुबे की तबियत खराब रहने लगी थी. सितम्बर माह में उन्हें ब्रेन स्ट्रोक हुआ था, जो जीवन के अंतिम सफ़र की वजह भी बना. भावनात्मक रूप से वे जितने संवेदनशील थे, उससे कहीं ज्यादा सृजन में संवेदनशील थे. इनका अंतिम संस्कार रविवार, २५ दिसंबर की शाम को मुंबई के शिवाजी पार्क शमशान गृह में किया गया.
७५ वर्षीय सत्यदेव दुबे के जीवन की पृष्ठभूमि प्रतिष्ठित रही है. छितानी मितानी परिवार बिलासपुर (छतीसगढ़) का एक जाना माना परिवार है. बिलासपुर के खांटी पुराने मुहल्ले गोंड पारा में १९ मार्च १९३६ को गया प्रसाद दुबे के यहाँ इनका जन्म हुआ था. इनके पिताश्री की इच्छा थी सत्यदेव इंग्लिश की पढ़ाई में अव्वल रहे, इसलिए इन्हें  आरंभिक शिक्षा बिलासपुर के रेलवे इंग्लिश मीडियम स्कूल में दिलवाई गई थी. उस जमाने यह एंग्लो इंडियन लोगों का स्तरीय स्कूल समझा जाता था. एक एंग्लो इंडियन परिवार के संरक्षण में इन्हें इस स्कूल में एडमिशन मिला था. नवमी कक्षा के बाद फिर मैट्रिक इन्होने हिन्दी माध्यम वाले स्कूल लाल बहादुर शास्त्री शाला से किया था. शालेय शिक्षा के दौरान ही इनके पिताश्री की मृत्यु हो गई थी. सत्यदेव दुबे जब दस साल थे, तब आलू पराठे खाने का बेहद शौक था. बचपन में इनका अधिकतर लालन पालन चाचा काशीप्रसाद दुबे के यहाँ हुआ था. चाचा के घर से लगा हुआ ब्रिजवासी होटल गोलबाजार के संचालक कल्लामल ब्रिजराज खंडेलवाल का घर भी था. दोनों घर की छत एक थी. इसी छत में खेलने के दरम्यान बालक सत्यदेव अक्सर खंडेलवाल जी के घर पहुँच जाते फिर उस घर की बड़ी बहू जो स्वादिष्ट शुद्ध घी के आलू पराठे बनाने में माहिर थी, से आलू पराठा खिलाने का बाल हठ करते. बालक सत्यदेव नाटकीय अंदाज वाले थे, इसलिए बड़ी बहू कहती "पहले अपना डांस दिखाओ तब आलू पराठा मिलेगा". फिर आलू पराठे के लालच में सत्यदेव ठुमक ठुमक कर डांस करते. इस दौरान घर की सभी महिलाएं एकत्रित हो जाती थीं. सत्यदेव बिना झेंपे सबका मनोरंजन करते थे.
सत्यदेव दुबे के बाल्यकाल का नाटकीय अंदाज युवा अवस्था में परिष्कृत हो गया था. मुंबई के जेवियर्स कालेज में जाने पर यह नाटकीय अंदाज कलात्मक सृजन में परिवर्तित हो गया. यहाँ से स्नातक होने के बाद वर्ष १९५९ में सत्यदेव दुबे ने सागर यूनिवर्सिटी से इंग्लिश में मास्टर आफ आर्ट्स (गोल्ड मेडलिस्ट) की डिग्री ली थी. इसके बाद कुछ समय तक इन्होने बिलासपुर के एस.बी.आर. कालेज में पढ़ाया भी था. बिलासपुर के  देश विख्यात "तीन एस." में से वे एक थे. तीन एस. यानी साहित्यकार- राजनीतिज्ञ श्रीकांत वर्मा, नाटककार डा. शंकर शेष और सत्यदेव दुबे. इन तीनों ने अपने अपने तरीके से बिलासपुर का नाम पूरे देश में रोशन किया. ये तीनों विभूतियाँ आज इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन लोगों के दिलों में अवश्य बसे हैं.                .
बिलासपुर के गोंड पारा की घुमावदार गलियों में सत्यदेव दुबे का बाल्यकाल गुजरा था. गोलबाजार के निकट स्थित हरदेव लाला मंदिर के आसपास बैठ कर वे दोस्तों से गप्पे लड़ाते थे. बाल्यकाल की इन यादों को उन्होंने अपने सृजन में भी उकेरा था. स्कूली जीवन से ही इन्हें क्रिकेट के खेल में ज्यादा रुचि थी, जो मुंबई जाने का कारण बनी थी. टेस्ट प्लेयर बनने का सपना उन्हें मुंबई खींच ले गया था, लेकिन बन गए नाटक और सिनेमा के खिलाड़ी, जो आख़री समय तक क्रीज पर बने रहे. पारिवारिक बंटवारे में बिलासपुर का पुराना सिनेमा हाल श्याम टाकिज इनके हिस्से में आया था. एक समय ऐसा भी आया जब पूर्व मंत्री अशोक राव  इसका संचालन कर सत्यदेव दुबे की आर्थिक सहायता करते रहे. बिलासपुर में रामचंद और बाजपेयी बाड़ा इनकी बैठकी का पसंदीदा स्थल था. जस्टिस के.के. वर्मा और बाजपेयी जी का बँगला इनका बौद्धिक विचार विमर्श का प्रमुख स्थान हुआ करता था. मध्यप्रदेश शासन में मंत्री रहे और सत्यम टाकिज के संचालक अशोक राव से इनकी गहरी दोस्ती थी. मुंबई वासी हो जाने के बाद भी जब वे बिलासपुर आते तब वे अशोक राव के यहाँ ही ठहरते. ख़ास सिने पटकथा, संवाद लेखन के लिए भी वे उनके यहाँ गुप्त रूप से आते थे. कुछ रोज बाद फिर वे किसी से मिले बगैर वापस मुंबई लौट जाते थे. यहाँ जब भी आते तो दिन में दो चार बार गुड़ाखू करना नहीं भूलते थे.
साहित्यकार पालेश्वर शर्मा भी बिलासपुर के प्रारम्भिक प्रमुख युवा मित्रों में से एक रहे. इन्होने ही सत्यदेव दुबे को मुंबई जाने से पहले डा. धर्मवीर भारती के चर्चित रेडियो प्ले "अंधा युग" के बारे में बताया था और उसे नयी स्क्रिप्ट के साथ रंगमंच पर प्रस्तुत करने की प्रेरणा दी थी. सत्यदेव दुबे ने नयी स्क्रिप्ट लिखकर १९६२ में इसका मंचन इब्राहिम अल्काजी के निर्देशन में मुंबई और दिल्ली में करवाया था. इस प्ले को नव आयाम देने से डा. धर्मवीर भारती स्वयं इनकी प्रयोगशीलता से बेहद प्रभावित थे.
मुंबई के जेवियर्स कालेज में पढ़ाई के दौरान सत्यदेव दुबे देव आनंद के भाई विजय आनंद के संपर्क में आये थे. वे ही इनके सृजन के सफ़र के सूत्रधार बने थे. उनके बहु आयामी व्यक्तित्व का बीजारोपण हो गया. शुरूआती दौर में थियेटर उनके लिए महज शौकिया था, जो आगे चलकर जूनून बन गया.  पीडी शिनॉय और निखिल जी की बताई रंग राह मंजिल की तरफ ले गई. वे इब्राहिम अल्काजी के थियेटर से जुड़ गए. फिर तो निर्बाध रंग यात्रा शुरू हो गई. देसी विदेशी नाटको के मंचन में उन्हें समान रूप से ख्याति मिली. हिन्दी, मराठी, गुजराती के अलावा इंग्लिश और फ्रेंच नाटको की सफल प्रस्तुतियों से उनकी पहचान प्रयोगधर्मी रंगकर्मी बतौर अधिक बनी. नाटक "अंधा युग" (डा. धर्मवीर भारती), "ययाति", "हयवदन" (गिरीश कर्नाड), "एवम इन्द्रजीत", पगला घोड़ा" (बादल सरकार), "और तोता बोला" (चन्शेखर काम्ब्रा), "आधे अधूरे" (मोहन राकेश), "गिधाडे", "शांतता ! कोर्ट चालू आहे" (विजय तेंदुलकर) आदि नाटकों के जरिये सत्यदेव दुबे रंगकर्म की दुनिया के एक सशक्त हस्ताक्षर बन गए. बिलासपुर के अपने नाट्य लेखक मित्र डा. शंकर शेष, जो १९७४ में मुंबई वासी हो गए थे, का नाटक "अरे मायावी सरोवर" का सफल मंचन इन्होने सौ बार से ज्यादा किया था. फ्रेंच नाटक "एंटीगोने " के  कलात्मक मंचन से उच्च वर्ग के दर्शकों में इनकी पैठ गहरी हुई. मुंबई के पृथ्वी थियेटर को स्थापित करने में इनके मंचित नाटकों का भी बड़ा हाथ रहा. जार्ज बर्नाड शा के नाटक "जूआन इन हेल" का मंचन जब इन्होने मुंबई के नरीमन पाइंट स्थित टाटा थियेटर में किया था तब समाप्ति के बाद दर्शक इन्हें बधाई देने के लिए टूट पड़े थे.
सत्यदेव दुबे जब मुंबई में रंगकर्म के क्षेत्र में कमर कस कर सक्रिय हुए तब उस समय व्यावसायिक तौर पर द्विअर्थी गुजराती और मराठी नाटकों का बोलबाला था. आज के कुछ स्थापित फिल्म और टीवी अभिनेता उसी दौर के नाटकों के रास्ते से आये हैं. इंग्लिश नाटकों का भी तब वर्चस्व था. उस वक्त मुंबई में हिन्दी नाटकों का व्यायसायिक स्थान चौथे क्रम पर था. ऐसे विपरीत रंग परिदृश्य में सत्यदेव दुबे ने हिन्दी नाटकों को टिकट खिड़की पर ग्राह्य बनाया.
नवमे दशक आते तक हिन्दी रंगमंच जगत में एम्.एस. सथ्यू, अंजन श्रीवास्तव (इप्टा), इला अरुण (सुरनयी ), नादिरा बब्बर (एकजुट), दिनेश ठाकुर (अंक), ओम कटारे (यात्री), संजना कपूर (पृथ्वी प्रोडक्शन), मकरंद देशपांडे (प्लेटफार्म प्ले), फिरोज खान (प्लेटफार्म परफार्मेंस) आदि नाट्य निर्देशक अपने अपने थियेटर ग्रुप के मार्फ़त पृथ्वी थियेटर में सक्रिय होकर सत्यदेव दुबे के लिए चुनौती सदृश्य बन गए थे. किन्तु अपनी शर्तों पर जीने वाले सत्यदेव दुबे ने अपने समकक्ष के रंगकर्म की प्रत्येक चुनौती को सहर्ष स्वीकारा था. हिन्दी नाट्य मंडलियों की इस प्रतिस्पर्धी चुनौती में उनका रंगकर्म अलग अंदाज का था. कम किन्तु अच्छी प्रस्तुति उनका ध्येय होता था. वे व्यावसायिकता की अंधी रंग दौड़ में धावक बनना नहीं चाहते थे. उनका दर्शक वर्ग तय था. वह उनकी बेबाक और कलात्मक प्रस्तुति की प्रतीक्षा करता रहता था. लगन, जोश और जुनून उनकी रंग कार्य शैली के प्रमुख घटक थे. सत्यदेव दुबे ने अपनी नाट्य संस्था "संवर्धन" (पुराना नाम- थियेटर यूनिट) के संचालक और निर्देशक का दोहरा प्रभार बखूबी सम्हाला था. पृथ्वी थियेटर में नाटक "एजुकेटिंग रीता", "गांठ" और "स्ट्रिपटीजन पुलिस" के अनूठे मंचन से उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई थी. पृथ्वी थियेटर से ही इनकी दोस्ती अभिनेता अमरीश पुरी, कुलभूषण खरबंदा, नसीरूद्दीन शाह , ओमपुरी, इला अरूण , स्मिता पाटिल, शबाना आजमी, निर्देशक श्याम बेनेगल और सिनेमेटोग्राफर, निर्देशक गोविन्द निहलानी से हुई थी. आगे चलकर ये हस्तिया सिने सफ़र में भी इनके साथ रहीं. सत्यदेव दुबे पृथ्वी थियेटर के बाहरी खुले परिसर में होने वाले निःशुल्क प्लेटफार्म प्ले के नवोदित कलाकारों और उनके निर्देशकों को प्रोत्साहित भी किया करते थे, ताकि पूरी ऊर्जा के साथ वे परिमार्जित होकर भविष्य में पृथ्वी थियेटर के भीतरी व्यावसायिक मंच पर अपनी प्रतिभा प्रस्तुत कर सकें. उनसे पहली बार जो भी काम मांगने या सहयोग लेने के मद्देनजर मिलता, तो सर्वप्रथम वे उसकी बाडी लेग्वेज पर गौर फरमाते. फिर बातचीत के दौरान उसकी भाषा शैली और कार्य लक्ष्य परखते. अगर सामने वाला कहीं से भी कमजोर दिखता तो वे उसकी वहीं क्लास ले लेते थे. वह आगंतुक चाहे उनका रिश्तेदार ही क्यों न हो, उनके बेबाक, अक्खड़, गुस्सैल व्यवहार से ऐसे लोग काँप उठते थे. लेकिन वे दिल के बेहद साफ़ इंसान थे. उनके भीतर का एक मददगार इंसान किसी को बिना परखे बाहर आसानी से नहीं आता था. इसीलिये वे लोग उनको समझने में भूल करते थे. दरअसल, उनकी मंशा होती थी संघर्ष करने आया व्यक्ति कोई भी "शार्ट कट" मार्ग न अपनाए. अन्यथा सपनों की नगरी मुंबई में उसका कोई वजूद न रहेगा. सत्यदेव दुबे ने अपने भतीजे संकल्प दुबे (राजा बाबू दुबे के द्वितीय पुत्र), जो वर्ष १९७९ में बिलासपुर से मुंबई एक्टर बनने गए थे, को भी यही नसीहत दी थी. उन्होंने उसे कहा था- "अपना स्वतंत्र अस्तित्व बनाओ. किसी की सिफारिश के बजाय अपनी प्रतिभा के बूते आगे बढ़ो". भतीजा संकल्प दुबे भी स्वाभिमानी था. उसने कक्का के आदेशमाय सुझाव का सम्मान करते हुए अपनी अलग राह चुनी. उसने विभिन्न निर्देशकों के साथ बीस नाटकों में अभिनय किया था. सईद अख्तर मिर्जा के टीवी सीरियल "नुक्कड़" में चाय वाले तंबी का किरदार निभाया था. फिल्म "चक्र", "अपमान", "सारांश", "मोहन जोशी हाजिर हो" और "आघात" में भी इसने संक्षिप्त भूमिका अदा की थी. फिर सत्यदेव दुबे ने अपने भाई राजा बाबू के तीसरी पीढी के अभिनेता पोते और सुतीक्ष्ण दुबे के पुत्र सत्यजीत दुबे (शाहरूख खान की फिल्म "आलवेज कभी कभी" के नायक और टीवी सीरियल "झांसी की रानी" के नाना साहेब) को भी खुद अपना मुकाम बनाने की सलाह दी थी. सत्यजीत ने ऐसा किया भी. सत्यदेव दुबे के अंतिम दिनों का सत्यजीत साक्षी और सेवक भी है.                                              
सत्यदेव दुबे के सृजन जीवन में कर्म और पुरस्कार दोनों के मायने अलग अलग थे. रंगकर्म के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान देने के फलस्वरूप सत्यदेव दुबे को सबसे पहले मध्प्रदेश शासन की तरफ से शिखर सम्मान से विभूषित किया गया था. वर्ष १९७१ में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से इन्हें सम्मानित किया गया था. पुरस्कार और सम्मान पाने के लिए उन्होंने कभी भी कोई जुगत और न ही कोई लाबिंग की. यह उनकी प्राथमिकता में शामिल भी नहीं था. उन्होंने पुरस्कार और सम्मान पाने की अपेक्षा कभी नहीं की. स्वयं अपनी जन्मभूमि बिलासपुर और अपने राज्य छतीसगढ़ की सरकार से भी नहीं. छत्तीसगढ़ का दुर्भाग्य है उनका कोई नाटक राज्य में कहीं भी मंचित न हो सका. वर्ष २००१ में जब वे अपने व्यक्तिगत प्रवास पर बिलासपुर आये थे तब उन्हें लाल बहादुर शास्त्री शाला परिसर में लगे पुस्तक मेले में बुलाकर सम्मान की औपचारिकता निभाई गई थी. वे गीता दर्शन में भरोसा रखते थे. "कर्म करो, फल की चिंता मत करो" यह सूत्र वाक्य उन्होंने मुंबई जाते ही अपना लिया था. लेकिन इज्जत के साथ मिले राष्ट्रीय पुरस्कारों को ग्रहण कर उन्होंने उनका सम्मान जरूर बढाया. वर्ष १९७८ में इन्हें श्याम बेनेगल निर्देशित फिल्म "भूमिका" की उत्कृष्ट पटकथा लेखन के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था. जबकि वर्ष १९८० में फिल्म "जुनून" में बेहतर संवाद लेखन के लिए फिल्म फेयर अवार्ड मिला था. वर्ष २०११ में इन्हें पद्मभूषण सम्मान से नवाजा गया था. ( जारी )          

@ दिनेश ठक्कर "बापा"
(चित्र : गूगल से साभार)