ग्रंथागार केवल गोदाम नहीं
किताबों का
और प्रदर्शन स्थल भी नहीं
चाहे अपना हो या सरकारी
इसे कमतर आंकना नहीं
किताबों से भरी है अलमारी
कुछ जान कर खरीदी
और कुछ आदतन
किसी ने भेंट स्वरूप दी
उपकृत होती रही अलमारी
अपना सच्चा मित्र बताया
किताबों को
और स्वयं को भरमाया
कुछ पन्ने पढ़ कर
अलमारी का भार बढ़ाया
सबके बीच बौद्धिक बनाया
किताबों ने
लिखने बोलने योग्य बनाया
पुरस्कार सम्मान दिलाया
फिर भी इनको श्रेय न दिया
समय संग धूल चढ़ती रही
किताबों पर
दीमकों की फौज बढ़ती रही
चूहों का आहार बनती रही
उपेक्षा का दंश झेलती रही
सहेजने की जरूरत न समझी
किताबों को
त्यौहार आए तो सफाई सूझी
ग्रंथागार की
फिर भी ये समस्या न सुलझी
छत से टपकता रहता है पानी
बरसात का
भीग कर किताबों के निकलतेआंसू देख
क्यों नहीं होती हैं ये आंखे नम
बापा रहे ना रहे अस्तित्व रहेगा
किताबों का
अगली पीढ़ी को जरूर मिलेगा
ज्ञान का खजाना
ग्रंथालय उन्हें इंसान बनाएगा
-दिनेश ठक्कर "बापा"
(चित्र : गूगल से साभार)

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