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शनिवार, 6 सितंबर 2014

धवल जीवन का ब्लैक बोर्ड

सरस्वती को पूजने वाला शिक्षक
पिस रहा है आज
दो विषम पाटों के बीच
सिद्धांत और स्थितियों के मध्य
घर्षण कर रहा है उसे मर्माहत
भविष्य गढ़ते गढ़ते
वर्तमान होने को है कालातीत
सबके ज्ञान चक्षु खोलते खोलते
बंद होने को आतुर हैं उसकी आंखें
मिट्टी को आकार देने वाले हाथ
अब जीवन से कर रहे हैं दो दो हाथ
गरीबी में भी पाठ पढ़ाते पढ़ाते
अब झुक गई है उसकी कमर
महंगाई की मार झेलते झेलते
अब टूट गई है उसकी कमर

बचपन में माँ से मिले संस्कार
बुढ़ापे में भी बढ़ा रहे हैं हिम्मत  
ईमानदारी है बुढ़ापे की लाठी
प्रेरणादायी है इसकी कद काठी
रगों में संचारित है सेवा का रक्त
शिक्षा मंडी से नहीं रखा सरोकार
ज्ञान के व्यापार का नहीं है पक्षधर
तराजू से स्वयं को रखा है दूर
तुला नहीं इसीलिये अतुलनीय हैं

लक्ष्मी के उल्लू बिना मांगे
आज भी देते रहते हैं उसे सलाह
लक्ष्मी की पूजा करो
और अपना उल्लू सीधा करो
घी निकालना है तो उंगली टेढ़ी करो
छप्पर के मकान में रहने वाले
सरस्वती पूजक शिक्षक
लक्ष्मी की पूजा करो
फिर ऊपर वाला देगा छप्पर फाड़ के
परंतु सिद्धांतवादी शिक्षक
लक्ष्मी के उल्लुओं से है असहमत
धवल जीवन के ब्लैक बोर्ड पर वह
नहीं लिखना चाहता है काला अध्याय
उसे स्वीकार है उसका कोरा रह जाना
मिट्टी को आकार देते हुए
उसे स्वीकार है मिट्टी में मिल जाना
लक्ष्मी की पूजा करते हुए
उसे स्वीकार नहीं है पत्थर बन जाना

जो उसके भीतर है वही बाहर भी है
वह फलों से लदे वृक्ष की मानिंद है
जड़ से उखाड़ दिए जाने के बाद भी
पीढ़ियों को अपनी ताकत दे जाएगा
झंझावतों से सतत जूझने के बाद भी
अनुभवों से सबक लेना सीखा जाएगा
गुरू और गोविंद में फर्क बता जाएगा
साल में एक बार याद करने पर भी
गुरू घंटालों को वह मंच दे जाएगा

@ दिनेश ठक्कर "बापा"
     (चित्र : गूगल से साभार)  



शुक्रवार, 8 अगस्त 2014

कोणार्क का अकेला घोड़ा















समय के मारक प्रहार से
हो चुका है मरणासन्न  
कोण के अर्क का रथ
धूमिल हो गई है आभा
तेजस्वी सौंदर्य की
ठंडी हो गई है ऊर्जा
अनवरत गमन की
विध्वंसकों की चाबुक से
कालकवलित हो गए
छह घोड़े
साथ छोड़ गया सारथी
अरूण
हो रहा है असमय अस्त
कोणार्क
खंडित रथ के पहियों ने भी
अलग बना ली है पहचान
और अकेला छोड़ दिया है
इकलौते बचे घोड़े को
कोणार्क का अकेला घोड़ा
शोक संतप्त है
अब अपने अकेलेपन से
अपंग होकर जूझ रहा है
स्वयं अपने अस्तित्व से

क्या इसीलिये नरसिंह तुमने
कोण के सूर्य को
पत्थरों से रथारूढ़ कराया था
कि आस्था मोम की तरह
कभी यूं ही पिघल न जाये
किंतु नरसिंह तुम यह भूल गए
कि राज विद्वेष की तपन
आस्था को पिघला देगी
और फिर हुआ भी ऐसा
यदाकदा विद्वेषी मनुष्य
पत्थर दिल बन कर
श्रद्धा मार्ग से करते रहे विमुख
कोणार्क के रथ को
खंड खंड करते रहे आस्था को
व्यथित सदियों ने भी देखा है
विद्वेषी मनुष्य को पत्थर बनते
इसके बाद भी क्या यही कहेंगे
कि कोणार्क के पत्थरों की भाषा
अच्छी है मनुष्यों की भाषा से

कोणार्क का अकेला घोड़ा
नहीं कर सका है विस्मृत
अपने अतीत की गति को
सप्त अश्व युक्त रथ के पहिए
सातों दिवस बारहों मास
सहायक थे गतिशीलता में
उदित मध्यान्ह अस्त सूर्य
ऊर्जित रहते रथारूढ़ होकर
देवदासियों की नर्तन मुद्राएं
प्रेमी युगल की काम क्रियाएं
देव, गंधर्व, जीव की अवस्थाएं
गूढ़ भावार्थ देती रही रथ को
काला पहाड़ की क्रूरताएं
कारण बनी रथ विखंडन की
शिखर छत्र पृथक किए गए  
रथच्युत किया कोणार्क को
आसंदी में रेत पत्थर भरे गए
रथ रक्षार्थ नव ग्रह बेबस हुए
अपनी ही रक्षा में विफल हुए
पूर्ण ग्रहण लगा कोणार्क को
तरस रहा है वह मोक्ष के लिए

कोणार्क का अकेला घोड़ा
अतीत की छाया से है हताश
वर्तमान की उपेक्षा से निराश
भविष्य की दशा से है आक्रांत
बिरंची नारायण बिना टूटा रथ
अब और उसे नहीं देखा जाता
रथ के ध्वंसावशेष की वेदना
अब और उससे नहीं सही जाती
वह जान गया है श्रद्धा का मार्ग
अब कोणार्क के हिस्से में नहीं है
आस्था के फूल अब पत्थर बन गए हैं
वह जान गया है सारथी अरूण
पुरी स्थित जगन्नाथ मंदिर के सिंह द्वार समक्ष
स्पर्शी स्तम्भ पर अनाथ बैठा है
नाथ का संग साथ पाने वह असमर्थ है
वैभव वापसी की स्तुति असफल है
नहीं मिल रहा मोक्ष प्राप्ति का कोई संकेत
वह जान गया है कोण का सूरज
अब कोणार्क लौटना नहीं चाहता है
कोणार्क का अकेला घोड़ा
अपने अकेलेपन से दुःखित है
वह आशंकित है
कि किसी सांझ, सूर्यास्त होते ही
उसका जीवन भी हो जाएगा अस्त !

@ दिनेश ठक्कर "बापा"
     ( तस्वीरें : दिनेश और प्रीति ठक्कर )



सोमवार, 4 अगस्त 2014

कहीं दूर गगन की छांव में

राग रागिनियों की थी वो बेला  
उनके संग आया सुरों का रेला
पीछे छोड़ गए वे यादों का मेला
ऊपर वाले ने ये कैसा खेल खेला

आए थे वे जमीं पर खुद रोते हुए
चले गए वे जग को हंसाते हुए  
जीवन की उलझन छिपाते हुए
गीत जीवंत वे कर गए गाते हुए

याद आते तो गाती है हर धड़कन
ह्रदय को होता सुरों पर अभिमान
सुन कर स्वस्थ हो जाता तन मन
रगों में प्रवाहित होती सुरीली तान

खिलंदड़ चेहरे ने दर्द खूब छिपाए
हाथ की लकीरों ने कई भेद दबाए
अनकही दास्तां भी साथ छोड़ गए
विधि के विधान को कौन पढ़ पाए

आंसुओं से सींचा खुशी का तराना
सुन कर उसे खुश होता है जमाना
महफिल में झूम उठता है दीवाना
गीतों में चाहता हर कोई खो जाना

कह रहे हैं सिसकते हर साज
तेरे बिना जीना दुश्वार है आज
उखड़ी उखड़ी सी सांसें सुरों की
तान थम सी गई है तरानों की

सरगम की उदास बगिया में
सुगंध नहीं मिलती है फूलों में
भौंरों ने छोड़ दिया है मंडराना
कलियों को न भाता है खिलना

कहीं दूर गगन की छांव में
यादों के साज की संगत में
गा रहे हैं वे अकेले अकेले
सुन रहे हैं चांद तारे अलबेले  

उस आभासी गगन के तले
न गम मिले न आंसू निकले  
उन्हें अब प्यार प्यार ही मिले
सूरज की पहली किरण मिले !

@ दिनेश ठक्कर "बापा"
(चित्र : गूगल से साभार)

शनिवार, 2 अगस्त 2014

मरते नहीं हैं कभी प्रेमचंद

मरते नहीं हैं कभी
प्रेमचंद
जीवित रहते हैं सदा
प्रेमचंद
सच्चे शब्दार्थों में
निःस्वार्थ कलम में
उत्पीड़ित देह में
शोषित पात्रों में
आक्रांत बस्तियों में
सतत जागृत रखना हैं
शब्द साधकों को
प्रेमचंद
अपने सार्थक सृजन में
बोध कराना है अक्षरों में
प्रेमचंद
होने के अपने सही मायने
अभिव्यक्ति की अनुभूति
शब्दों की व्यंजना
अक्षरों का अंकन
वाक्यों का विन्यास
रचना की सार्थकता
होगी सफल जब कभी
हम झांकेंगे अपने भीतर
ह्रदय से होंगे एकाकार
प्रेमचंद की आत्मा से
तब पुनः दिखेंगे सृजन में
प्रेमचंद

@ दिनेश ठक्कर "बापा"
     (चित्र : गूगल से साभार) 

फिर कब आओगे रफी












अकेले अकेले कहां चले गए
रफी
सुरों को बेसहारा क्यों कर गए
रफी
राग रागिनियों को क्यों रूला गए
रफी
गाते सुनते आंखों में उतर आए
रफी
आंसू बन कर तुम छलक गए
रफी
छलकते आंसू भी मोती बन गए
रफी
यादें अपनी छोड़ गए गाते हुए
रफी
ढूंढ रहा है जमाना तुम्हें रोते हुए
रफी
सुर ताल प्रतीक्षारत हैं पूछते हुए
फिर कब आओगे
रफी
सरगम ने जब तुम्हारे गीत सुनाए
रफी
साज भी जब संग संग गुनगुनाए
रफी
नग़मों में अक्स तुम्हारे उभर आए
रफी
यूं भुला ना पाएंगे वक़्त के पहरुए
रफी

जब भी ख्यालों में तुम आए
रफी
मौसिक़ी में तुम ही नजर आए
रफी
वो समा हम ना भुला पाए
रफी
गायिकी को गुलज़ार कर गए
रफी
ढूंढती ग़मगीन निगाहें बुलाए
रफी
चाहने वालों को बहुत याद आए
रफी
गाने वाले दर्द में डूबे गीत गाए
रफी
साजिंदे सिसकता साज सुनाए
रफी
रोज पुरानी राहों से आवाज दिए
रफी
फिर कब आओगे
रफी

@ दिनेश ठक्कर "बापा"
     (चित्र : गूगल से साभार)

शनिवार, 26 जुलाई 2014

पुरी के काष्ठमय जगन्नाथ














जगन्नाथ करते हैं स्नान
बद्रीनारायण में
श्रृंगार स्थल है
द्वारका
करते हैं अन्न का भोग
पुरी में
जगन्नाथ का शयन स्थल है
रामेश्वरम
मान्यताओं के हैं ये चार धाम

जगन्नाथ का अन्न भोग तीर्थ
पुरी
आबद्ध है आध्यात्मिक आस्था
और दार्शनिक विशेषणों से
पुरूषोत्तम, उड्डियान, जमनिक
कुशा, शंख, नीलाद्रि, श्री क्षेत्र
जगन्नाथ धाम को करते हैं
उद्बोधित
अपने शब्दार्थों से आस्थावान
पुरूषोत्तम शंख क्षेत्र पुरी
पीढ़ियों का है आस्था धाम

जगन्नाथ मंदिर है समर्पित
विष्णु के अवतार कृष्ण को
परंतु कृष्ण के ज्ञान से परे
आस्था के शंखनाद के साथ
प्रतिमा पर वर्चस्व का चक्र
करता रहा रक्तरंजित
राजकीय इतिहास को
सदियों की साक्षी स्याही ने
दर्ज कर दी है अपनी पीड़ा
पीढ़ियों के समय ध्वज पर

मगध नरेश महाझपनंद
प्रतिमा हरण से हुए कलुषित
कलिंग सम्राट खारवेल के
पराक्रम से हुआ प्रतिमा का
पुनः प्रतिष्ठापन
उत्कल नरेश ययाति केशरी
मंदिर भव्यता के बने निमित्त
समय और समुद्री जलवायु
खंडित करती रही
श्रद्धा की शिला से निर्मित
जगन्नाथ मंदिर को
गंगवंशीय नरेश चोड़गंग देव
अनंत बर्मन अनंगभीम देव
खुर्दा नरेश रामचन्द्र देव
पुनर्निर्माण के बने माध्यम

कलिंग शैली की स्थापत्य
वास्तु शिल्प कला
वक्र रेखीय आकारयुक्त
जगन्नाथ मंदिर को देती है
नव आयाम
गर्भ गृह के हैं सार्थक मायने
रत्न मंडित पाषाण चबूतरा
विराजित वेदिका स्थल है
जगन्नाथ, बलभद्र, सुभद्रा का
काष्ठमय प्रतिमाएं
जीवंत होने की देती है प्रेरणा
विमान, मुखशाला, जगमोहन
भोग मंडप हैं मंदिर के प्रभाग
शिखर पर स्थापित नील चक्र
प्रतीक है सुदर्शन चक्र का
लहराता लाल ध्वज
संकेत देता है
जगन्नाथ की उपस्थिति का

पूर्व में सिंह, पश्चिम में बाघ
उत्तर में हाथी, दक्षिण में अश्व
ये चार दिशा प्रवेश द्वार हैं
मतान्तर दर्शनाभिलाषियों के हैं
परंतु मंदिर के भीतर मिलती
एकाकार होने की सीख
सिंह द्वार सन्मुख अरुण स्तंभ
सूर्य शक्ति का है परिचायक
अरुण स्तंभ के स्पर्श पश्चात प्रवेश
यानी स्वयं को आलोकित कर
जगन्नाथ के निकट जाना है
चहारदीवारी मेघनाथ प्राचीर
रोकती है समुद्र की गर्जना
संदेश देती है दर्शनार्थियों को
क्रोध कलह स्वर शांति का
असहिष्णु न बनने का
यहां की बाईस सीढ़ियां हैं
असल में अवगुणों की
जिसे पार कर मिलता है
दर्शन लाभ जगन्नाथ का
 
वृहद रसोई घर में बनते हैं
जगन्नाथ के लिए
नैवेद्य योग्य विविध व्यंजन
चढ़ता है भोग महाप्रसाद
धन्य होते ग्रहण कर दर्शनार्थी
कैसी है विडम्बना
कैसा है विरोधाभास
कैसी है मानवीय सोच
मंदिर के बाहर बेबस बैठे
भूखे पेट हाथ फैलाए
लाचार दरिद्र नारायण में
क्यों नहीं दिखते हमें
जगन्नाथ
क्यों नहीं चढ़ाते इनके सन्मुख
भोग चढ़ावा
क्या इनसे नहीं मिलेगा पुण्य
कब तक रहेगा ये प्रश्न अनुत्तरित

जगन्नाथ कहलाते हैं
पतित पावन
अस्पृश्य पतित जनों के हैं
उद्धारकर्ता
सिंह द्वार के निकट भी विराजित
बाहर से भी मिलता दर्शन लाभ
फिर हम क्यों उलझे हैं
छुआछूत के मकड़जाल में
फंसे हैं वर्ण भेद के भंवर में
दुःखित पतित जनों में
क्यों नहीं दिखते हमें
जगन्नाथ
कब होगा हमारा दिल दिमाग
पावन
इसका जवाब जगन्नाथ ही जाने

काष्ठ खंड में भी रहते जीवंत
जगन्नाथ
भावानुरूप होते हैं श्रृंगारित
जगन्नाथ
तिथि विशेष में होते वेशधारित
जगन्नाथ
एक विग्रह में बहु विन्यासित
जगनाथ
पद्म, स्वर्ण, गजेंद्र मोक्ष वेश
प्रलंबासुर वध, कालिया दमन
वन भोजि, रघुनाथ, नरसिंह वेश
राधा दामोदर वेश में भी श्रृंगारित
जगन्नाथ
कल्याण भाव करते हैं प्रस्फुटित
विविध वेश से करते हैं प्रमाणित
जगन्नाथ
सत्कर्मों से होगा जीवन फलित
जगन्नाथ
अपने बहुरूप से हमें करते प्रेरित
व्यक्तियों का चेहरा हो छद्म रहित
हर चेहरा हो कल्याण भाव सहित
मुखौटा धारण में हो अच्छी नीयत
तभी होगा हमारा जीवन आनंदित

रथ यात्रा में एकता होती है प्रदर्शित
हर वर्ग के श्रद्धालु होते हैं हर्षित
जगन्नाथ
नंदी घोष रथ पर होते विराजित
बलभद्र
तालध्वज रथ पर होते विराजित
सुभद्रा
देवदलन रथ पर होती हैं विराजित
सांकेतिक रंगों से होते सुसज्जित
रस्सा खींचते हाथ आस्था सहित  
गुंडिचा मंदिर होते हैं ये प्रस्थित
बाहुड़ा यात्रा भी करती है प्रफुल्लित


मंदिर से बाहर आकर विराजित
रथारूढ़ जगन्नाथ
संदेश देते हैं जन प्रतिनिधियों को  
जनता के बीच रहने का
समभाव के साथ मिलने का
सबके विकास की रथ यात्रा में एकता का
प्रगति से जुड़े हाथ में हों निहित
जगन्नाथ
सर्व कल्याणकारी हो अपने अपने
जगन्नाथ

@ दिनेश ठक्कर "बापा"
     (मंदिर के सामने मेरी तस्वीर - प्रीति ठक्कर द्वारा, शेष चित्र गूगल से साभार)





 
 
 
     













गुरुवार, 24 जुलाई 2014

काष्ठ रूप जगन्नाथ

दशपल्ला के अरण्य में हुआ
सूत्रपात
विप्र विद्यापति बने
सूत्रधार
नीलमाधव दर्शन उपरांत सुनी
देववाणी
काष्ठ रूप में तैरते पहुंचेंगे स्वयं
जगन्नाथ
चक्र तीर्थ सागर तट तीरे
और यही काष्ठ खण्ड होंगे
पूजित

लौटे विप्र और सुनाई गाथा
पंडुवंशीय नरेश इंद्रद्युम्न को
सच हुई घोषित पूर्णिमा पर
देववाणी
मिले सागर तट तीरे काष्ठ खंड
शंख चक्र गदा पद्म उत्कीर्ण
तीन काष्ठ
अनुष्ठान यज्ञादि पश्चात
प्रस्थित कराए जनकपुर गुंडिचा

आए बूढ़े बढ़ई के छद्म वेश में
सृष्टिकर्ता
दिया सशर्त प्रस्ताव इंद्रद्युम्न को
काष्ठ से देव विग्रह निर्माण का
व्यवधान रहित बंद कमरे में
प्रारम्भ हुआ प्रतिमा निर्माण
कुछ दिनों बाद जिज्ञाशावश
इन्द्रद्युम्न ने किया वचन भंग
खोल दिया कमरे का दरवाजा
अदृश्य था बूढ़ा बढ़ई
मिले अर्ध निर्मित तीन विग्रह
कोहनी हथेली चरण विहीन
जगन्नाथ बलभद्र और सुभद्रा
इन्हीं रूपों में होते हैं विग्रह  
पूजित
मान्यताओं के हैं ये श्रद्धा शब्दार्थ

अधूरे अंग होने के बाद भी होते हैं
पूजित
काष्ठमय जगन्नाथ
परंतु पूरे अंग पाने के बाद भी
प्राणमय व्यक्ति
दुष्कर्मों के फलीभूत होता है
लज्जित
संपूर्ण अंगों का करता नहीं है
सदुपयोग
जिंदा लाश बन कर
ढोता रहता है जिंदगी का बोझ
हाड़ मांस वाला भी बन जाता है
काष्ठमय व्यक्ति
और देह दाह होता है लकड़ियों से

@ दिनेश ठक्कर "बापा"
 (चित्र : गूगल से साभार)