अभिव्यक्ति की अनुभूति / शब्दों की व्यंजना / अक्षरों का अंकन / वाक्यों का विन्यास / रचना की सार्थकता / होगी सफल जब कभी / हम झांकेंगे अपने भीतर

शनिवार, 26 जुलाई 2014

पुरी के काष्ठमय जगन्नाथ














जगन्नाथ करते हैं स्नान
बद्रीनारायण में
श्रृंगार स्थल है
द्वारका
करते हैं अन्न का भोग
पुरी में
जगन्नाथ का शयन स्थल है
रामेश्वरम
मान्यताओं के हैं ये चार धाम

जगन्नाथ का अन्न भोग तीर्थ
पुरी
आबद्ध है आध्यात्मिक आस्था
और दार्शनिक विशेषणों से
पुरूषोत्तम, उड्डियान, जमनिक
कुशा, शंख, नीलाद्रि, श्री क्षेत्र
जगन्नाथ धाम को करते हैं
उद्बोधित
अपने शब्दार्थों से आस्थावान
पुरूषोत्तम शंख क्षेत्र पुरी
पीढ़ियों का है आस्था धाम

जगन्नाथ मंदिर है समर्पित
विष्णु के अवतार कृष्ण को
परंतु कृष्ण के ज्ञान से परे
आस्था के शंखनाद के साथ
प्रतिमा पर वर्चस्व का चक्र
करता रहा रक्तरंजित
राजकीय इतिहास को
सदियों की साक्षी स्याही ने
दर्ज कर दी है अपनी पीड़ा
पीढ़ियों के समय ध्वज पर

मगध नरेश महाझपनंद
प्रतिमा हरण से हुए कलुषित
कलिंग सम्राट खारवेल के
पराक्रम से हुआ प्रतिमा का
पुनः प्रतिष्ठापन
उत्कल नरेश ययाति केशरी
मंदिर भव्यता के बने निमित्त
समय और समुद्री जलवायु
खंडित करती रही
श्रद्धा की शिला से निर्मित
जगन्नाथ मंदिर को
गंगवंशीय नरेश चोड़गंग देव
अनंत बर्मन अनंगभीम देव
खुर्दा नरेश रामचन्द्र देव
पुनर्निर्माण के बने माध्यम

कलिंग शैली की स्थापत्य
वास्तु शिल्प कला
वक्र रेखीय आकारयुक्त
जगन्नाथ मंदिर को देती है
नव आयाम
गर्भ गृह के हैं सार्थक मायने
रत्न मंडित पाषाण चबूतरा
विराजित वेदिका स्थल है
जगन्नाथ, बलभद्र, सुभद्रा का
काष्ठमय प्रतिमाएं
जीवंत होने की देती है प्रेरणा
विमान, मुखशाला, जगमोहन
भोग मंडप हैं मंदिर के प्रभाग
शिखर पर स्थापित नील चक्र
प्रतीक है सुदर्शन चक्र का
लहराता लाल ध्वज
संकेत देता है
जगन्नाथ की उपस्थिति का

पूर्व में सिंह, पश्चिम में बाघ
उत्तर में हाथी, दक्षिण में अश्व
ये चार दिशा प्रवेश द्वार हैं
मतान्तर दर्शनाभिलाषियों के हैं
परंतु मंदिर के भीतर मिलती
एकाकार होने की सीख
सिंह द्वार सन्मुख अरुण स्तंभ
सूर्य शक्ति का है परिचायक
अरुण स्तंभ के स्पर्श पश्चात प्रवेश
यानी स्वयं को आलोकित कर
जगन्नाथ के निकट जाना है
चहारदीवारी मेघनाथ प्राचीर
रोकती है समुद्र की गर्जना
संदेश देती है दर्शनार्थियों को
क्रोध कलह स्वर शांति का
असहिष्णु न बनने का
यहां की बाईस सीढ़ियां हैं
असल में अवगुणों की
जिसे पार कर मिलता है
दर्शन लाभ जगन्नाथ का
 
वृहद रसोई घर में बनते हैं
जगन्नाथ के लिए
नैवेद्य योग्य विविध व्यंजन
चढ़ता है भोग महाप्रसाद
धन्य होते ग्रहण कर दर्शनार्थी
कैसी है विडम्बना
कैसा है विरोधाभास
कैसी है मानवीय सोच
मंदिर के बाहर बेबस बैठे
भूखे पेट हाथ फैलाए
लाचार दरिद्र नारायण में
क्यों नहीं दिखते हमें
जगन्नाथ
क्यों नहीं चढ़ाते इनके सन्मुख
भोग चढ़ावा
क्या इनसे नहीं मिलेगा पुण्य
कब तक रहेगा ये प्रश्न अनुत्तरित

जगन्नाथ कहलाते हैं
पतित पावन
अस्पृश्य पतित जनों के हैं
उद्धारकर्ता
सिंह द्वार के निकट भी विराजित
बाहर से भी मिलता दर्शन लाभ
फिर हम क्यों उलझे हैं
छुआछूत के मकड़जाल में
फंसे हैं वर्ण भेद के भंवर में
दुःखित पतित जनों में
क्यों नहीं दिखते हमें
जगन्नाथ
कब होगा हमारा दिल दिमाग
पावन
इसका जवाब जगन्नाथ ही जाने

काष्ठ खंड में भी रहते जीवंत
जगन्नाथ
भावानुरूप होते हैं श्रृंगारित
जगन्नाथ
तिथि विशेष में होते वेशधारित
जगन्नाथ
एक विग्रह में बहु विन्यासित
जगनाथ
पद्म, स्वर्ण, गजेंद्र मोक्ष वेश
प्रलंबासुर वध, कालिया दमन
वन भोजि, रघुनाथ, नरसिंह वेश
राधा दामोदर वेश में भी श्रृंगारित
जगन्नाथ
कल्याण भाव करते हैं प्रस्फुटित
विविध वेश से करते हैं प्रमाणित
जगन्नाथ
सत्कर्मों से होगा जीवन फलित
जगन्नाथ
अपने बहुरूप से हमें करते प्रेरित
व्यक्तियों का चेहरा हो छद्म रहित
हर चेहरा हो कल्याण भाव सहित
मुखौटा धारण में हो अच्छी नीयत
तभी होगा हमारा जीवन आनंदित

रथ यात्रा में एकता होती है प्रदर्शित
हर वर्ग के श्रद्धालु होते हैं हर्षित
जगन्नाथ
नंदी घोष रथ पर होते विराजित
बलभद्र
तालध्वज रथ पर होते विराजित
सुभद्रा
देवदलन रथ पर होती हैं विराजित
सांकेतिक रंगों से होते सुसज्जित
रस्सा खींचते हाथ आस्था सहित  
गुंडिचा मंदिर होते हैं ये प्रस्थित
बाहुड़ा यात्रा भी करती है प्रफुल्लित


मंदिर से बाहर आकर विराजित
रथारूढ़ जगन्नाथ
संदेश देते हैं जन प्रतिनिधियों को  
जनता के बीच रहने का
समभाव के साथ मिलने का
सबके विकास की रथ यात्रा में एकता का
प्रगति से जुड़े हाथ में हों निहित
जगन्नाथ
सर्व कल्याणकारी हो अपने अपने
जगन्नाथ

@ दिनेश ठक्कर "बापा"
     (मंदिर के सामने मेरी तस्वीर - प्रीति ठक्कर द्वारा, शेष चित्र गूगल से साभार)





 
 
 
     













गुरुवार, 24 जुलाई 2014

काष्ठ रूप जगन्नाथ

दशपल्ला के अरण्य में हुआ
सूत्रपात
विप्र विद्यापति बने
सूत्रधार
नीलमाधव दर्शन उपरांत सुनी
देववाणी
काष्ठ रूप में तैरते पहुंचेंगे स्वयं
जगन्नाथ
चक्र तीर्थ सागर तट तीरे
और यही काष्ठ खण्ड होंगे
पूजित

लौटे विप्र और सुनाई गाथा
पंडुवंशीय नरेश इंद्रद्युम्न को
सच हुई घोषित पूर्णिमा पर
देववाणी
मिले सागर तट तीरे काष्ठ खंड
शंख चक्र गदा पद्म उत्कीर्ण
तीन काष्ठ
अनुष्ठान यज्ञादि पश्चात
प्रस्थित कराए जनकपुर गुंडिचा

आए बूढ़े बढ़ई के छद्म वेश में
सृष्टिकर्ता
दिया सशर्त प्रस्ताव इंद्रद्युम्न को
काष्ठ से देव विग्रह निर्माण का
व्यवधान रहित बंद कमरे में
प्रारम्भ हुआ प्रतिमा निर्माण
कुछ दिनों बाद जिज्ञाशावश
इन्द्रद्युम्न ने किया वचन भंग
खोल दिया कमरे का दरवाजा
अदृश्य था बूढ़ा बढ़ई
मिले अर्ध निर्मित तीन विग्रह
कोहनी हथेली चरण विहीन
जगन्नाथ बलभद्र और सुभद्रा
इन्हीं रूपों में होते हैं विग्रह  
पूजित
मान्यताओं के हैं ये श्रद्धा शब्दार्थ

अधूरे अंग होने के बाद भी होते हैं
पूजित
काष्ठमय जगन्नाथ
परंतु पूरे अंग पाने के बाद भी
प्राणमय व्यक्ति
दुष्कर्मों के फलीभूत होता है
लज्जित
संपूर्ण अंगों का करता नहीं है
सदुपयोग
जिंदा लाश बन कर
ढोता रहता है जिंदगी का बोझ
हाड़ मांस वाला भी बन जाता है
काष्ठमय व्यक्ति
और देह दाह होता है लकड़ियों से

@ दिनेश ठक्कर "बापा"
 (चित्र : गूगल से साभार)

गुरुवार, 26 जून 2014

वृक्ष संहार














विकास की वेदी पर
चढ़ती है सदा
वृक्षों की बलि
प्रगति का मंत्रोच्चारण
हरियाली की आहुति
देने पर
भड़क उठती है
विनाश की ज्वाला
तब
हर पत्ता हर टहनी
मांगते हैं
अपनी मौत का हिसाब
यही है प्रकृति का गणित

चलती जब कुल्हाड़ी आरी  
वृक्ष की जड़ों पर
तब
वृक्ष के साथ
आदमी भी
अलग होता है
अपने अस्तित्व से
दम तोड़ते हैं दोनों
पहले वृक्ष
फिर आदमी
प्रकृति की मार
पड़ती है सब पर भारी

जड़ों से कट जाने के बाद
मरा वृक्ष
लावारिस शव सदृश्य
लेटा रहता है जमीन पर
सुनाता है मौत की गाथा
फूल फल छांव देने वाला
मरा वृक्ष
तरसता है
श्रद्धांजलि के फूल के लिए
सोचता है
क्यों भोगना पड़ा ये फल
तपती दोपहरी में
धूप का कफ़न ओढ़े
वंचित रहता है
आदर की छांव के लिए

शव बना वृक्ष बांट जोहता हैं
चार मित्र कंधों की
आशा करता है
सम्मान से अर्थी निकलने की
सत्य ही गत्य हैं
राम नाम सत्य है
सरीखे शव यात्रा शब्दार्थों की
लेकिन
दुर्गति ही भाग्य में लिखी है


अब यह विडम्बना है
गति बढ़ गई विकास की
लकड़ियां बची नहीं है
चिता के लिए
चाहे मरा वृक्ष हो या आदमी
अब राख होना होगा
विद्युत शव दाह गृह में
चिंता है सबको प्रगति के लिए
यही सत्य अंतिम संस्कार है
यही वृक्ष संहार का परिणाम है

संकट आएगा सांस लेने का
अभाव होगा छांव हवा का
तब
समझेंगे महत्व वृक्ष का
चिता जलाने वालों को
चिंता होगी वृक्ष की
तब
फिर होगा पौधारोपण
भ्रष्टाचार का
हरियाली की आड़ में
संहारकों की जेब
हो जाएगी हरी
होता रहेगा आक्रमण
वृक्षों पर
क्रम जारी रहेगा वृक्ष संहार का

- दिनेश ठक्कर "बापा"
   (पेंटिंग- गूगल से साभार, बाकी फोटो अश्विनी ठाकुर द्वारा)







सोमवार, 23 जून 2014

अभिव्यक्ति पर आघात












पढ़ाई के बाद कोई काम मिला नहीं
तो कलम थाम ली
मालूम था इतना आसान नहीं
दुर्दिन को कलमना

रखना था स्याही से सरोकार
अंदेशा भी था स्याह होने का
सामने लाना था शब्दों से सच
खतरा था सुर्खियां बनने का

सुधारना था समाज वाक्यों से
जानता था असामाजिक होना
कठिन था सामाजिक व्याकरण
संबल मिला सच्ची पंक्तियों से

गलत व्यक्ति का सही चेहरा
मुखौटे से उसे अनावृत्त करना
प्रलोभन संग व्यक्तिगत होना
यह कार्य है बड़ा जोखिम भरा

आदमी को इंसान बनाना
आसान नहीं है इतना
रगों में इंसानियत का रक्त
चाहता है यह विषम वक्त  

शक्ति की अस्मत लुट जाना
निःशक्त का घर उजड़ जाना
शब्दों का निःशब्द हो जाना
दुखद है कलम का कुंद होना

अभिव्यक्ति पर आघात बढ़ना
फिर भी कलम मुखर रखना
जान हथेली पर लेकर
लिखना होगा निडर होकर

-दिनेश ठक्कर "बापा"
 (चित्र : गूगल से साभार)




 




  

शनिवार, 21 जून 2014

किताबों का क्रंदन















ग्रंथागार केवल गोदाम नहीं
किताबों का
और प्रदर्शन स्थल भी नहीं
चाहे अपना हो या सरकारी
इसे कमतर आंकना नहीं

किताबों से भरी है अलमारी
कुछ जान कर खरीदी
और कुछ आदतन
किसी ने भेंट स्वरूप दी
उपकृत होती रही अलमारी

अपना सच्चा मित्र बताया
किताबों को
और स्वयं को भरमाया
कुछ पन्ने पढ़ कर
अलमारी का भार बढ़ाया

सबके बीच बौद्धिक बनाया
किताबों ने
लिखने बोलने योग्य बनाया
पुरस्कार सम्मान दिलाया
फिर भी इनको श्रेय न दिया

समय संग धूल चढ़ती रही
किताबों पर
दीमकों की फौज बढ़ती रही
चूहों का आहार बनती रही
उपेक्षा का दंश झेलती रही

सहेजने की जरूरत न समझी
किताबों को
त्यौहार आए तो सफाई सूझी
ग्रंथागार की
फिर भी ये समस्या न सुलझी

छत से टपकता रहता है पानी
बरसात का
भीग कर किताबों के निकलते
आंसू देख
क्यों नहीं होती हैं ये आंखे नम

बापा रहे ना रहे अस्तित्व रहेगा
किताबों का
अगली पीढ़ी को जरूर मिलेगा
ज्ञान का खजाना
ग्रंथालय उन्हें इंसान बनाएगा

-दिनेश ठक्कर "बापा"
  (चित्र : गूगल से साभार)



  

रविवार, 15 जून 2014

बापूजी का बनाया घर









बापूजी का बनाया घर
मेरा ही हक़ नहीं इस पर
यदा कदा सांप आ जाते
रहने का हक़ जता जाते  
आस्तिन में हैं सांप रहते
इसलिए नहीं लगता भय

रहते यहां मेंढक निर्भय
बढ़ रहा उनका परिवार
वे नहीं हैं बरसाती मेंढक
उनका व्यवहार है पृथक
टर्राना उनको न सुहाता
वे भी नहीं बनना चाहते
मेरी तरह कुएं के मेंढक
पसंद नहीं है उछलना
जमीन पर रहना भाता
   
बिल्लियों का आशियाना
मौक़ा पाते दूध पी जाना
ठंड में रजाई में दुबकना
फिर भी मनुष्यों से कम
अपनी चालाकी दिखाना
कभी अपनापन जताना
ये घर नहीं लगता बेगाना

कभी चूहे देख मुंह फेरना
अचंभित करता है याराना
चूहे बिल्ली का साथ रहना
शत्रु भाव को भी परे रखना
मनुष्यों को है शिक्षा लेना
 
बढ़ती जा रही छिपकली
दीवारें बनी ठौर ठिकाना
टंगी दीवार घड़ी की तरह
हर वक्त की याद दिलाती
कीड़े मकोड़ों को दबोचना
दबंगों सा अहसास कराती
शिकार पर नजरें गड़ाना
मौका मिलते लील जाना
दुष्टों जैसी बन गई प्रवृत्ति  
सतर्क रहने की सीख देती

ये दिन भी शेष था देखना
अब मीठा बोलने पर भी
निकल आतीं हैं चीटियां
नमक अदा करने पर भी
उमड़ पड़ती हैं चीटियां
अच्छे दिन आने पर भी
चीटियों के पर निकलना
पैदा करती कई भ्रांतियां
नियति है इनके बीच रहना
अपनी जमीन से जुड़े रहना

नहीं आसान ये दुख भुलाना
सड़क चौड़ीकरण का बहाना
घर के सामने पेड़ का कटना
चिड़ियों का बसेरा उजड़ना
न सुनना उनका चहचहाना
वे थी आनंददायक पड़ोसी
आंगन में भी होता था आना
दुखद है स्मृति शेष हो जाना

-दिनेश ठक्कर "बापा"
  (चित्र : गूगल से साभार) 

बुधवार, 11 जून 2014

हम हैं उम्मीदों के रखवाले

हम हैं उम्मीदों के रखवाले
सुनेंगे सबके दर्द भरे नाले
विकास करेंगे हम मतवाले
देश को हैं आगे बढ़ाने वाले

इधर बैठे या फिर बैठे उधर
हम चलेंगे सामूहिकता पर
हमें भरोसा नहीं संख्या पर
सबका भला करेंगे मिल कर
हम हैं उम्मीदों के रखवाले....

आशाओं को है पूरा करना
कसौटी पर है खरा उतरना
सिर ऊंचा कर आगे बढ़ना
सीना तान कर है चलना
हम हैं उम्मीदों के रखवाले....

अब हर हाथ को काम मिले
गरीबों का चूल्हा जरूर जले
लाचारों को भी शिक्षा मिले
आओ गांवों का जीवन बदलें
हम हैं उम्मीदों के रखवाले....

मजदूर किसान का हो भला
आंसू पोंछने का मौका मिला
आलोचना से है संबल मिला
मिट्टी का कर्ज चुकाने चला
हम हैं उम्मीदों के रखवाले....

अच्छाई के पथ पर हम चलें
बुराइयों को किनारे कर लें
भाईचारे के साथ गले मिले
हम हैं उम्मीदों के रखवाले....

-दिनेश ठक्कर "बापा"
  (चित्र : गूगल से साभार)