चिर निद्रा में लीन मौतचिंताओं से परे चिता पर
गीली लकड़ियों कंडों से
हो रही है धुआं धुआं
और
गीली आंखों से जिंदगी
भड़का रही है आग
जैसे जैसे भड़क रही आग
वैसे वैसे सूखते जा रहे हैं
जिंदगी की आंखों से आंसू
मौत राख में विलीन होने पर
श्मशान में संवेदनाएं रख कर
अहंकारी सिर पर पानी छिड़क
नीम की कुछ पत्तियां चबा कर
और अधिक कड़वा कर मुंह
जिंदगी पुराने रूख के साथ
कठोर कदमों के सहारे
लौट आती है कड़वाहट लेकर
अपने निष्ठुर ठौर ठिकाने पर !
@ दिनेश ठक्कर बापा
(चित्र गूगल से साभार)
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