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सोमवार, 7 मार्च 2016

आस्तीन के सांप


देश और समाज के कंटकों, दुश्मनों,
आतंकियों को शक्तिशााली बनानेे वाले
उनको अपना मोहरा बनाने वाले
स्वार्थ के लिए उनकी सहायता करने वाले
उनकी दुर्गति और मौत का मातम मनाने वाले
असल में हैं वे आस्तीन के सांप

वे डंसते हैं
देश और समाज की एकता, अखंडता, सौहार्द को
वे लगातार उगलते हैं
जहर अलगाव और आतंक का
वे महसूस करने लगे हैं
कि, वे हो गए हैं महा विषधर
बढ़ गई है उनकी महत्वाकांक्षा
बौरा गया है तन-मन झूठा सम्मान पाकर
अब वे होना चाहते हैं सर्वत्र पूजित
स्वार्थी आकाओं के गले का हार बन कर
वे चाहते हैं अमृत पीना
अपने भीतर का विष उगल कर
वे चाहते हैं समृद्ध होना
कृत्रिम जन आस्था से लिपट कर
लेकिन यह सब उनका मुगालता है

सच तो यह है
कि, जब वे
सियासी सपेरों के कब्जे में होंगे
तब तोड़ दिए जाएंगे
निर्ममता से उनके विषैले दांत
वे कैद कर दिए जाएंगे
गुलामी के पिटारे में
वे बना दिए जाएंगे
पालतू जीव जन प्रदर्शन के
तब वे केवल
स्वार्थ की बीन के आगे
फन उठा कर
फूंफकार कर
अपना सर्प-धर्म निभाएंगे
और
अपने स्वार्थी आकाओं की भूख मिटाएंगे !

@ दिनेश ठक्कर बापा
(चित्र गूगल से साभार)

शनिवार, 5 मार्च 2016

तवा गरम है सेंक लो रोटी


कुर्सी के भूखे आपस में जुट गए
स्वार्थ का चूल्हा जलाने के लिए
गिले शिकवे भूल गले मिल गए  
दुश्मनी छोड़ कर हाथ मिला लिए
आग लगाने हथकंडे अपना लिए
देशद्रोह की कुल्हाड़ी हाथों में लिए      
भविष्य का हरा पेड़ काटने लग गए
आजादी का चमन उजाड़ने लग गए
बली बनाने लगे बकरा बलि के लिए
आग लगाई तवा गरम करने के लिए

बदली में लाल सूरज की राह देखने लगे
धुंध में भी धूप की उम्मीद करने लगे  
काली घटाओं से सूरज जब बाहर आया
परछाई में कद लम्बा देख भ्रम हो गया
खुद को खलनायक से नायक बना पाया
तिरंगा लेकर देशभक्ति का नारा लगाया
बोलवचनों से आम आदमी को भरमाया
सियासी जमीं में नियोजित कदम बढ़ाया
चुनावी फसल काटने हेतु हंसिया उठाया
कुर्सी की भूख मिटाने ईंधन अन्न जुटाया

स्वार्थ के चूल्हे में अब भड़क उठी है आग
चूल्हे के लिए जुबां भी उगलने लगी आग
तवा गरम है सेंक लो रोटी
बलि के बकरे की खा लो बोटी बोटी
कुर्सी की भूख मिटा लो तोंद है मोटी
लोकतंत्र की तंग गलियां हैं बहुत छोटी
ज्यादा नहीं चल पाओगे तुम चालें खोटी
हिसाब चुकता करेगी मेरे देश की माटी !

@ दिनेश ठक्कर बापा
(चित्र गूगल से साभार)



 



 





 



 

 

गुरुवार, 3 मार्च 2016

मध्यम वर्ग की दुर्दशा

सत्ताधारियों की बदनीयत से
मध्यम वर्ग की नियति है 
त्रिशंकु बने रहने की
अर्थ रक्त पिपासु टोपीबाजों का
आसान शिकार बन गया है
अशक्त निहत्था मध्यम वर्ग
टैक्स महंगाई का बोझ ढोते ढोते
टूट गई है कमर उसकी
अब वह न घर का रहा न घाट का

सत्ता के भूखे सेंक लेते हैं अपनी रोटी
उसके गरम तवे पर
बैठते ही कुर्सी पर
निर्ममता से फेर देते हैं पानी
उसके चूल्हे और उम्मीदों पर
चला देते हैं सरकारी कैंची
उसकी जुबाँ और जेब पर
विकास के नाम पर करने भरपाई
भ्रामक जुमलों से देकर दुहाई
छीन ली जाती जोड़ी हुई पाई पाई
फिर गृहस्थी की दरकी दीवार पर
कील में टँगी रह जाती है
राहत और सुख चैन की अपेक्षाएं

मध्यम वर्ग पर मार चौतरफा है
महंगाई का दुरूह मार्ग पार करने
अर्थव्यवस्था के अंधे खूनी मोड़ पर
छोड़ दिया जाता उसे बेबस अकेला
प्रावधानों और कटौती के अवरोधक
धीमी कर देते हैं गति जीवन यात्रा की
यदि वह गंतव्य तक पहुँच गया
तो अपनी पीठ थपथपा लेते हैं सत्ताधारी
अन्यथा उसके सिर फोड़ देते हैं ठीकरा

मध्यम वर्ग की दुर्दशा है
कि उसकी सुनने वाला कोई नहीं
सियासी दांवपेंच में फंस गया है वह
सत्ताधारियों से निरंतर होती उपेक्षाओं से
लोकतंत्र के हाशिए में चला गया है वह
कड़वे अनुभव से हो रही है समाप्त
उसके गृहस्थ जीवन की मिठास

मध्यम वर्ग की विसंगति है
कि उसका बुढ़ापा आने पर
लग गई है नजर शातिर गिद्धों की
उसके भविष्य की निधि पर
उसके ताउम्र बचत के निवाले पर
तैयारी है झुण्ड में झपट कर नोंच खाने की
फिर यही गिद्ध आम चुनाव के वक्त
शांति के कबूतर बन कर
चुगेंगे दाना उसकी मंझोली मुँडेर पर
पेट भर जाने पर
बहुमत मिल जाने पर
उड़ जाएंगे ये कुनबे के साथ
और
आशियाना बना लेंगे
ऊँची आलीशान मुंडेर पर !

@ दिनेश ठक्कर बापा
(चित्र गूगल से साभार)

सोमवार, 29 फ़रवरी 2016

आम आदमी और बजट

विपक्ष में थे जब वे
बजट खराब लगता था
आम आदमी के लिए
बजट नकारा लगता था
बनाने लगे अब बजट वे
विपक्ष खराब लगता है
और बजट के लिए
आम आदमी नकारा लगता है

सत्ता पर जब आँखें गड़ी थी
आम आदमी तब उनके लिए
आँखों का तारा लगने लगा
सत्ता में आते ही आम आदमी
आँखों को काँटे सा चुभने लगा
खास आदमी
आँखों को फूल सा सुहाने लगा
बजट बनने लगा
खास आदमी के फायदे के लिए
आम आदमी घाटे में रहने लगा
बजट पेश करने से पहले ही वे
मिल बाँट कर खा लेते हैं हलवा
और बजट की कड़वाहट
छोड़ जाते हैं आम आदमी के लिए

बजट को विकासपरक बता कर वे
आम आदमी को सपने दिखाते हैं
खास आदमी के सपने साकार करते हैं
आम आदमी के हिस्से की धूप वे
खास आदमी के सुपुर्द कर देते है
अच्छे दिन केवल अपने लिए लाते है वे
और बजट प्रावधानों के बोझ तले
जीते जी मरता रहता है आम आदमी

सत्ता हाथ से निकलते देख कर वे
बजट बनाते हैं आम आदमी के लिए
अगला आम चुनाव सम्पन्न होने तक
आँखों का तारा फिर से बन जाता है
आम आदमी !

@ दिनेश ठक्कर बापा
(चित्र गूगल से साभार)

शनिवार, 27 फ़रवरी 2016

भड़क उठी है स्वार्थ की ज्वाला

बहुत गुस्से में हैं इन दिनों वे
उतार रहे हैं गुस्सा दूसरों पर
पीछे रह जाने का भ्रम हैं उन्हें
रौंद कर आगे बढ़ना चाहते हैं वे
उनके सीने में भड़क उठी है
स्वार्थ की ज्वाला फिर इस बार
व्यवस्था के प्रति आगबबूला हैं वे
स्वार्थ की आग से उबल रहे हैं वे
इसलिए सरे राह लगा रहे हैं आग
सब कुछ राख कर देना चाहते हैं वे
देश जलता रहे, परवाह नहीं है उन्हें
हाथों में हिंसा का झंडा डंडा लेकर
पशुता का प्रदर्शन बेख़ौफ़ कर रहे हैं वे
हैवानियत की सभी सीमा लांघ रहे हैं वे
लोकतंत्र की सड़कों को अवरूद्ध कर
भीड़तंत्र को अपना हथियार बना कर
संपत्ति अस्मत खुले आम लूट रहे हैं वे
अपने जीवन की गाड़ी दौड़ाने खातिर
दूसरों की जिंदगी बेपटरी कर रहे हैं वे
योग्य लोगों की लकीरों को मिटा कर
अपनी लकीर बढ़ाना चाहते हैं वे
पात्र जनों का हक जबरिया छीन कर
खुद अधिकार संपन्न बनना चाहते हैं वे
क्या ये दबंग अग्निपुरुष नहीं जानते
कि स्वार्थ और ईर्ष्या की इस आग से
स्वयं भी झुलस जाएंगे एक दिन वे !

@ दिनेश ठक्कर बापा
(चित्र गूगल से साभार)

शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2016

अब तो हल्ला बोल

तुम अन्याय के खिलाफ
खड़े होते क्यों नहीं
हल्ला बोलते क्यों नहीं
भुखमरी, शोषण के विरुद्ध
आवाज उठाते क्यों नहीं
आखिर कब तक दुबके रहोगे
आँखें कब खुलेंगी सोए जमीर की ?

कड़वा सच है यह
सब देख, सुन, जान, सह कर भी
मौन रहने वाला
होता है मुर्दे की मानिंद
इसलिए समय रहते
जमीर के साथ स्वयं को भी जगाओ
अपने अधिकार, कर्तव्य को समझो
आवाज दबाने वालों से सतर्क रहो
उनका मुखौटा उतारना होगा
हल्ला बोलने और हल्ला मचाने वालों में
अंतर समझना होगा
पहचान जरूरी है अपने और परायों की
वक्त का तकाजा है इस विषम स्थितिं में
अब तो हल्ला बोल !

@ दिनेश ठक्कर बापा
(चित्र गूगल से साभार)

गुरुवार, 25 फ़रवरी 2016

हम चुप क्यों हैं

हम चुप क्यों हैं
किस भय से सहमे हुए हैं हम
सम्पूर्ण ज्ञानार्जन, समझदारी
सत्यवादी और राष्ट्रवादी होते हुए भी ?

हम चुप क्यों हैं
मात्र इस आशंकावश
कि कहीं मुखर हुए
और सच बोले तो
आधे अधूरे ज्ञानी, राष्ट्रद्रोही, उग्रवादी
सदा के लिए कहीं चुप न करा दें हमें !

@ दिनेश ठक्कर बापा
(चित्र गूगल से साभार)